हरीश रावत जैसा दिग्गज भी शांत नहीं कर पा रहा पंजाब कांग्रेस की कलह, पार्टी में बन चुके हैं दो धुव्र

चंडीगढ़ : पांच बार सांसद, केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत को जब पंजाब का प्रभारी बनाया गया तो लगा था कि वह कांग्रेस में चल रहे कलह को शांत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

उनकी छवि एक ऐसे नेता की थी, जिसकी बात को कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसा दिग्गज भी काट न पाए। मगर ऐसा नहीं हुआ। ऐसा नहीं कि उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं के बीच रिश्तों में जमीं बर्फ को वह पिघला नहीं पाए।

आशा कुमारी के बाद प्रदेश मामलों का प्रभारी बनने से लग रहा था कि आने वाले दिनों में कांग्रेस की आंतरिक कलह को वह शांत कर देंगे और कांग्रेस एक बार फिर 2022 में सत्ता में लौट सकती है, लेकिन आज स्थिति उन हालात से बिल्कुल विपरीत हो गई जो सितंबर 2020 में थे, जब हरीश रावत को पंजाब मामलों का प्रभारी बनाया गया था।

दरअसल, मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हरीश रावत को उस समय भाव देना बंद कर दिया जब रावत ने नवजोत सिद्धू को कांग्रेस का भविष्य बताया। 2019 के संसदीय चुनाव के बाद जिस तरह से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिद्धू को हाशिए पर धकेल दिया और डेढ़ साल तक सिद्धू एक शब्द नहीं बोले, उन सिद्धू को वापस कैबिनेट में लाने के लिए हरीश रावत ने प्रयास तेज कर दिए।

कभी नाश्ते पर तो कभी उनके साथ लंच पर बात करके रावत ने सिद्धू को मनाया और उनकी दो बार सीएम के साथ बैठक करवाई। कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने सिद्धू को कैबिनेट में वापस स्थानीय निकाय विभाग में नहीं लिया, जहां से उन्हें हटाया गया था। जब कोई बात नहीं चली तो हरीश रावत उन्हें प्रधान बनाने में जुट गए।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस मामले में उनकी चली। कैप्टन अमरिंदर सिंह अंत तक कहते रहे कि जट सिख को पार्टी प्रधान बनाने से हिंदू वर्ग में गलत संदेश जाएगा, लेकिन पार्टी हाई कमान ने इस बार कैप्टन को ज्यादा भाव नहीं दिया। युद्ध नीति के माहिर खिलाड़ी के तौर पर पहचाने जाने वाले कैप्टन ने राजनीतिक उबाल को ठंडा होने दिया। यहां तक कि कैप्टन ने अपने स्वाभाव के विपरीत सिद्धू की ताजपोशी वाले दिन सभी के सामने मिलकर चलने का संदेश दिया।

हालांकि उस दिन सिद्धू के व्यवहार ने हरीश रावत को भी असहज कर दिया। ऐसे में रावत को प्रियंका गांधी से हस्तक्षेप करवाने के लिए मजबूर होना पड़ा। अब जहां सिद्धू खेमे के विधायकों-मंत्रियों ने कैप्टन के खिलाफ बगावत कर दी है। वहीं, सिद्धू के सलाहकारों के बयानों के चलते कैप्टन गुट को भी मौका मिल गया है। कैप्टन गुट इस मामले में सिद्धू को निशाने पर ले रहा है।

हरीश रावत ने भी मामले की नजाकत को भांपते हुए जहां सिद्धू के सलाहकारों के प्रति सख्त रुख दिखाया है। वहीं, अब वे सिद्धू गुट के विधायकों से भी बातचीत कर सकते हैं। शुरू से ही दोनों तरफ बैलेंस बनाने की कोशिश तो रावत करते रहे हैं, लेकिन पंजाब कांग्रेस में कलह थाम नहीं पा रहे। 

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