काबुल की बहुमंजिला इमारतें-चकाचौंध देखकर हैरान हुए तालिबानी, कहा- वापस नहीं जाना चाहते

काबुल : एजानुल्लाह उन हजारों तालिबान आतंकियों में शामिल है, जिन्होंने पिछले हफ्ते अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अपना राज कायम कर लिया।

उसने काबुल जैसा नजारा इसके पहले कभी नहीं देखा था। काबुल की सड़कों के इर्द-गिर्द ऊंचे अपार्टमेंट वाले ब्लाक हैं, चमकती आफिस इमारतें और शापिंग माल हैं। गृह मंत्रालय के भीतर का फर्नीचर ऐसा है जैसा एजानुल्लाह और उसके सरीखे लड़ाकों ने पहले कभी सपने में भी नहीं देखा।

22 साल का एजानुल्लाह इसे छोड़कर नहीं जाना चाहता। अपने कमांडर को वह यह इच्छा बताने वाला है। यही असली अफगानिस्तान है। काबुल और उसके जैसे कुछ इलाकों की चमक अलग तस्वीर देती है और दूर-दराज व गांवों के इलाके अलग कहानी बयान करते हैं।

आतंक और कट्टरता की राह पर चलने वाले एजानुल्लाह सरीखे आतंकी इन्हीं दूर के इलाकों से आते हैं। तालिबान ने 20 साल पहले जब पहली बार अफगानिस्तान पर बंदूक के बल पर अपना राज कायम किया था, तब से काबुल और दूसरे शहर काफी बदल गए हैं।

अफगानिस्तान की अच्छी-खासी आबादी आधुनिकीकरण की कोशिशों और दुनियाभर से मिले मदद वाले पैसों से हुए छिटपुट विकास के बीच से उभरी है। एक बहुत बड़े वर्ग का मानना है कि ये सब जो हासिल हुआ था, वह आतंक के साये के कारण निष्फल होने जा रहा है।

डर की इसी आहट के कारण हजारों लोग देश छोड़ने की कोशिश में लगे हैं और काबुल एयरपोर्ट पर बस-टैंपों की तरह हवाई जहाज पकड़ने की कोशिश वाले दृश्य इसकी गवाही देते हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके परिवार उनके साथ नहीं हैं। युवा अफगानियों को पिछले तालिबान शासन की कोई याद नहीं है, लेकिन वे यह जानते हैं कि तालिबान की वापसी का मतलब आजादी छिन जाना है।

वे इस्लामिक कानून की 1996 से 2001 के बीच ऐसी व्याख्या कर चुके हैं कि कोई भी डर जाएगा। तालिबान अपनी छवि दुरुस्त करने के लिए कई घोषणाएं कर रहे हैं, लेकिन क्या वे भरोसा जगा पाएंगे। जवाब है- नहीं। तमाम अफगान, खासकर महिलाएं तालिबान के इरादों को लेकर संशय-संदेह में हैं। एजानुल्लाह से सड़क पर दो महिलाओं ने हेलो कहा।

एजानुल्लाह भी उन्हें अपनी बहन जैसी बता रहा है, स्कूल और आफिस जाने देने की बात कह रहा है, लेकिन उन्हें उस पर भरोसा नहीं है। दुनिया कुछ समय बाद ही जान पाएगी कि तालिबान वास्तव में बदले हैं या नहीं, लेकिन आज का अफगानिस्तान 1996 के अफगानिस्तान से अलग जरूर है। तब काबुल तबाह हो गया था।

तमाम अफगानी साइकिलों या पीली टैक्सियों से टूटी-फूटी सड़कों के जरिये काबुल पहुंचे थे। पूरे देश में केवल एक कंप्यूटर था और यह तालिबान सरगना मुल्ला मुहम्मद उमर के हाथ लगा था, जो उसे खोलना तक नहीं जानता था। आज अफगानिस्तान में चार मोबाइल कंपनियां और सेटेलाइट टीवी स्टेशन हैं, जिनमें महिला एंकर भी हैं।

इन्हीं में से एक ने सोमवार को तालिबान के एक लड़ाके का इंटरव्यू किया। आनलाइन मीडिया में तमाम वीडियो सामने आ रहे हैं जिनमें तालिबान लड़ाके मनोरंजन पार्क और इनडोर जिम में मौज-मस्ती करते नजर आ रहे हैं।

काबुल सरीखा शहर भी वर्षों से अपराध की गिरफ्त में है और तमाम लोगों को डर है कि तालिबान की चढ़ाई के बाद जिस तरह जेलें खाली कर दी गईं, हथियार लूट लिए गए उससे हालात और खराब होंगे। तालिबान ने कहा है कि वे कानून का राज कायम करेंगे, लेकिन इसमें वर्षों लग सकते हैं और वे कुछ भी करने के लिए कितना भी निर्मम हो सकते हैं। –

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