कृषि कानूनों के खिलाफ धरने से किसान करने लगे किनारा, अब खेतीबाड़ी संभालने में जुटें, आंदोलन की रफ्तार हुई धीमी

मथुरा : फसलों की कटाई, कोरोना महामारी या लंबा खिंचता आंदोलन। कारण कुछ भी हो, लेकिन अब कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन की रफ्तार मंद हो गई। मथुरा जिले से किसान गाजीपुर बार्डर पर धरने में नहीं जा रहे हैं। आंदोलन की शुरुआत में हर घर से एक व्यक्ति के धरने में शामिल होने का आह्वान किया गया था। यहां आंदोलन की कमान राष्ट्रीय लोकदल के तत्कालीन उपाध्यक्ष (अब अध्यक्ष) जयंत चौधरी ने संभाली थी। उन्होंने बलदेव के अवैरनी और बाजना में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ मंच साझा कर पंचायत की।

तीन फरवरी को अवैरनी चौराहा पर आए भाकियू युवा (टिकैत) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौरव टिकैत ने पंचायत में आह्वान किया कि गाजीपुर में चल रहे धरने में हर घर से एक सदस्य जाए। मंच पर बैठे पंचों ने भी इस पर सहमति दी। कुछ किसान धरने में शामिल होने गए भी, लेकिन धीरे-धीरे जाना कम हो गया। अब जिले से किसान आंदोलन में शामिल नहीं हो रहे हैं।

खेतों में मूंग, बाजरा, कपास, ज्वार की फसल खड़ी है। आंदोलन में जाने के बजाए किसान फसलों को संवारने में जुटे हैं। रालोद के जिलाध्यक्ष रामरसपाल पौनियां कहते हैं कि बढ़ते कोरोना संक्रमण के कारण अब किसान धरने पर नहीं जा रहे हैं। उधर भाकियू के जिला महासचिव देवेंद्र कुमार रघुवंशी कहते हैं कि पहले से किसानों का धरने पर जाना कम हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे जरूरत पड़ती है किसान जाते हैं।

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