क्रोध व अहंकार दोनों चीजें मनुष्य के जीवन को नर्क बना देती हैं -मुनिश्री
दतिया.मनुष्य को दो चीजों से हमेशा दूर रहना चाहिए। एक तो क्रोध व दूसरा अहंकार । यह दोनों चीजें मनुष्य के जीवन को नर्क बना देती हैं। जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता उसे नींद से उठाने की जरूरत पड़ती है, लेकिन जिसके पास धन होता है उसे सुलाने के लिए नींद की गोलियां देनी पड़ती है। इस लिए धन का लोभ त्यागें और धर्म की राह पर चलिए । यह विचार मुनिश्री प्रतीक सागर ने गुरूवार को सोनागिर स्थित आचार्यश्री पुष्पदंत सागर सभागृह में संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि हमें गुरु का हाथ नहीं पकड़ना चाहिए बल्कि गुरु को अपना हाथ पकड़ाना चाहिए। क्योंकि मुश्किल समय में हम गुरु का हाथ छोड़ सकते हैं, लेकिन गुरु हमारा हाथ कभी नहीं छोड़ेगा। उन्होंने कहा कि साधु और गुरू में अंतर होता है। साधु स्वयं के लिए होता है और अपना कल्याण करता है, जबकि गुरु शिष्यों के लिए समर्पित होता है और अपने शिष्यों का कल्याण करता है। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य को अपने बचे हुए धन में से धर्म के लिए दान दिया जाना भिक्षा के समान माना जाता है। दान अपने जीवन के खर्चों में से निकालकर दिया जाना ही परोपकारी दान होता है। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरे पास समय होगा तो ही मैं धर्म कर पाऊंगा। अपितु धर्म वहीं है जिसमें मनुष्य अपने कार्य को शुरू करने से पूर्व धर्म के लिए मंदिर जाकर भगवान की आराधना करें और उसके बाद अपने सांसारिक कार्यों को समय दे वहीं सच्चा धर्मी होता है।

उन्होंने कहा धर्म करोगे तो कोई संकट नहीं आएगा । जो शिक्षाएं दी गई हैं धर्म का मूल पाठ संयोग-वियोग, जीवन-मरण, सुख-दुख है, यह सब हमें स्वयं भोगना पड़ेगा। असली धर्म अच्छाई पर चलने का मार्ग है और बुराई पर नहीं चलने का नाम है। उन्होंने कहा कि धर्मी की पहचान क्या होती है जो पूजा करते हैं वह मंदिर तक सीमित रहते हैं, जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति के भगवान सब जगह साथ रहते हैं।चातुर्मास समिति के प्रचार संयोजक सचिन जैन आदर्श कलम ने बताया कि धर्म सभा के पहले समाजजनों ने आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर मुनिश्री प्रतीक सागर के चरणों मे श्रीफल भेंटकर मंगल आशीर्वाद लिया।

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