चंडीगढ़ : भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन टूटने के बाद शनिवार को शिरोमणि अकाली दल (शिअद) का बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से 25 साल बाद फिर गठजोड़ होना तय है। बसपा के वरिष्ठ नेता सतीश मिश्रा इस समझौते के लिए शुक्रवार को चंडीगढ़ पहुंच गए हैं। अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल और उनके बीच लंबी बैठक भी हुई जिसमें सीटों को लेकर बातचीत की गई।
बसपा को 2017 में मात्र 1.50 फीसद वोट शेयर मिला जो 2019 के लोकसभा चुनाव में 3.52 फीसद हो गया। यह पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि थी जिस पर सोचने के लिए दूसरी पार्टियां भी मजबूर हुईं।
इससे पहले 1996 के लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठजोड़ किया था जिसमें बसपा को तीन सीटों होशियारपुर, फिल्लौर और फिरोजपुर में सफलता मिली थी, लेकिन 1997 के विधानसभा चुनाव तक आते आते यह गठबंधन टूट गया। अकाली दल बसपा को 18 सीटें देने को तैयार है। बसपा की मांग 23 सीटों की है। इनमें दोआबा क्षेत्र के साथ ही फिरोजपुर की सीटों पर पार्टी की नजर है। 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा को दोआबा की कुछ सीटों पर अच्छे वोट मिले थे।
गौरतलब है कि पहले भाजपा के हिस्से में भी 23 ही सीटें गठबंधन में थीं। पंजाब में विधानसभा चुनाव को मात्र आठ महीने बचे हैं। ऐसे में नए बन रहे समीकरणों के चलते इस बार चुनाव काफी दिलचस्प होगा और अनुसूचित जाति की राजनीति के इर्द गिर्द ही घूमेगा। भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब में अनुसूचित जाति के चेहरे को मुख्यमंत्री के तौर पर लाने का एलान किया है।
वहीं, शिअद ने 2022 के चुनाव में अनुसूचित जाति से उपमुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने भी 2018 में अनुसूचित जाति के वोट को कैश करने के लिए सुखपाल सिंह खैहरा को हटाकर हरपाल चीमा को आगे किया और उन्हें विपक्ष का नेता बनाया। कांग्रेस भी पिछले कई दिनों से दलित वोट बैंक को भुनाने का प्रयास कर रही है।


