पटना : शरीर में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण लोगों में कई तरह के फंगस इंफेक्शन की आशंका बढ़ जाती है। ज्यादातर मामलों में दवा कारगर होती है। जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उनके लिए कभी-कभी यह घातक साबित होता है।
पटना के प्रमुख अस्पतालों के माइक्रोबायोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार ट्रू पैथोजिक सिस्टेमिक फंगस के छह प्रकार होते हैं। ये हमारे शरीर के अंदर परेशानी पैदा करते हैं। दुनिया में हिस्टो प्लाज्मा, पेनिसिलियम मार्नेफाइ, काक्सीडिवाइडिस इमिटिस, पैराकाक्सीडिवाइडिस ब्राजीलियंसिस, ब्लॉस्टोमाइटिस डर्मेटाइटिडिस व स्प्रोथिक्स सिस्टटेमिक फंगस हैं।
इसके अतिरिक्त क्रिप्टोकॉकस फंगस मैनिजाइटिस पैदा करता है। भारत में हिस्टो प्लाज्मा और ब्लास्टोमाइटिस डर्मेटाइडिटिस मिलता है। पेनिसिलियम मार्नेफाइ मणिपुर इलाके में मिलता है। यह फंगस लंग इंफेक्शन और मस्तिक ज्वर उत्पन्न करता है। यदि यह ब्लड में चला गया तो कई अंगों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह कामन नहीं है।
चिकित्सकों का कहना है कि ट्रू पैथोजिक सिस्टेमिक फंगस बीमारी के साथ होते हैं। जबकि अवसरवादी फंगस शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर हावी हो जाते हैं। इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस (आइजीआइएमएस) के माइक्रोबायोलाजी की विभागाध्यक्ष डा. नम्रता कुमारी ने बताया, कॉमन फंगस अक्सर अवसरवादी होता है।
बिहार के वातावरण में एस्परजिलस व कैंडिडा नाम के दो अवसरवादी फंगस कामन हैं। ये लंबे समय तक बीमार होने के बाद प्रतिरोधक क्षमता कम होने से प्रहार शुरू कर देते हैं। ये ज्यादा दिन तक एंटीबायोटिक्स और स्टेरायड व इमेनोस्प्रेसेंट लेने से होते हैं। खानपान में गड़बड़ी से भी फंगल इंफेक्शन होता है। इसके अतिरिक्त म्यूकर माइकोसिस ग्रुप आफ फंगस है। आमतौर पर लैब में इसकी पहचान मार्फोलॉजिकल बेसिस पर की जाती है। इनकी संख्या काफी है।


