देहरादून : उत्तराखंड में भू-कानून में संशोधन कर रियायत देने का विरोध शुरू होने के साथ ही सियासत भी तेज हो गई है। भूमि खरीद के नए रास्ते खुलने से उपजे असंतोष को भांपकर राजनीतिक दलों ने सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा को निशाने पर लेना शुरू कर दिया है।
इंटरनेट मीडिया में शुरू हुई मुहिम अब धरातल पर भी आकार लेने लगी है। कांग्रेस भी मोर्चाबंदी में जुट गई है।
20 साल में भू-कानून में तीन बड़े बदलाव किए जा चुके हैं। वर्ष 2017 में बदलाव के बाद नगर निकाय क्षेत्रों में शामिल किए गए ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन की खरीद-फरोख्त का रास्ता साफ हो गया है।
शहरी निकाय क्षेत्रों में भूमि खरीद के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं रह गई है। पर्वतीय क्षेत्रों में भी भूमि खरीद की सीमा को विस्तारित किया जा चुका है।
हालांकि सरकार ने भू-कानून को लचीला बनाने का यह कदम राज्य में पूंजी निवेश को ज्यादा से ज्यादा आमंत्रित करने के लिए उठाया है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून में सख्त व्यवस्था नहीं होने को लेकर विरोध मुखर हो गया है। सरकार के खिलाफ आवाज को हवा देने में जुटे विपक्षी दल 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं।
ऐसे में विपक्षी दलों ने विरोध की इस आवाज को हवा देनी शुरू कर दी है। केदारनाथ से कांग्रेस विधायक मनोज रावत ने विधानसभा के भीतर भू-कानून का विरोध किया था।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और उत्तराखंड दौरे पर आए राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट भी भू-कानून के खिलाफ उठ रही आवाज को समर्थन देने का एलान कर चुके हैं।
रावत बोले-भू-कानून में बदलाव तकलीफदेह: हरीश रावत ने कहा कि राज्य में लीज पर भूमि देने के लिए भी स्क्रूटनी की जाती रही है। अधिनियम में बड़ा परिवर्तन कर भूमि की खरीद के लिए पूरा दरवाजा खोल दिया गया है।
कोई भी जमीन खरीदे, कोई रोक-टोक नहीं है। रावत ने कहा कि हिमाचल के एक्ट में सुधार करते हुए कुछ बातों का समावेश कर भूमि सुधार के प्रश्न को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। वह सुनिश्चित करेंगे कि यह मुद्दा कांग्रेस के एजेंडे में रहे।


