संसद की तर्ज पर राज्यों में भी बने ‘डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म’: लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला का आह्वान; तिरुवनंतपुरम में ‘केरलम संकल्प’ पारित

तिरुवनंतपुरम/नई दिल्ली। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विधायी कामकाज में पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही को मजबूत करने के लिए संसद की तर्ज पर सभी राज्य विधानमंडलों में एक अत्याधुनिक ‘डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म’ विकसित करने का आह्वान किया है। तिरुवनंतपुरम में आयोजित संसद और राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों की लोक लेखा समितियों (PAC) के सभापतियों के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के डिजिटल तंत्र से कैग (CAG) की ऑडिट आपत्तियों की व्यवस्थित निगरानी होगी और लंबित जांच का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जा सकेगा।

सम्मेलन के दौरान सर्वसम्मति से ‘केरलम संकल्प’ (Keralam Resolution) को अंगीकार किया गया, जो आने वाले वर्षों में देश भर की विधायी समितियों को अधिक परिणामोन्मुखी, तकनीकी रूप से सक्षम और प्रभावी बनाने के लिए एक व्यापक रोडमैप के रूप में कार्य करेगा।

‘प्रौद्योगिकी जवाबदेही बढ़ाए, लेकिन मानवीय विवेक का विकल्प नहीं’

लोक सभा अध्यक्ष ने तकनीकी नवाचारों और मानवीय संवेदनशीलता के संतुलन पर बल दिया:

  • डेटा की प्रामाणिकता और निष्पक्षता: श्री बिरला ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म से प्राप्त आंकड़ों की शुद्धता और विश्वसनीयता ही सुशासन की नींव है। प्रौद्योगिकी संस्थागत जवाबदेही बढ़ाने का जरिया है, लेकिन यह कभी भी मानवीय विवेक और निर्णय क्षमता का स्थान नहीं ले सकती।

  • फाइलों से आगे सुधारात्मक कदम: उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑडिट आपत्तियां केवल सरकारी प्रतिवेदनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनके आधार पर कार्यपालिका के धरातलीय कामकाज में स्पष्ट सुधार दिखना चाहिए।

  • क्षमता निर्माण व प्रशिक्षण: पीएसी सदस्यों, कैग अधिकारियों और विधायी स्टाफ को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा उभरती तकनीकों का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे जटिल वित्तीय व्ययों की गहन जांच कर सकें।

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सार्वजनिक निवेश के विस्तार का उल्लेख करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ने कहा:

  • योजनाओं का वास्तविक प्रभाव: स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास और अधोसंरचना में खर्च हो रहे धन की जांच केवल वित्तीय सीमाओं तक सीमित न रहे। समितियों को यह भी देखना चाहिए कि क्या नागरिकों के जीवन स्तर में वास्तविक और मापनीय सुधार आया है।

  • समय-सीमा और गुणवत्ता: परियोजनाओं की समय पर पूर्णता, गुणवत्ता और लक्षित लाभार्थियों तक योजनाओं के सीधे लाभ की सतत समीक्षा लोक लेखा समितियों की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

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