नई दिल्ली : जैसा कि हमारे अपने वैक्सीन निर्माताओं ने भी देश के लिए किया है। फाइजर ने जैसे ही वैक्सीन की उपलब्धता का संकेत दिया, केंद्र सरकार और कंपनी वैक्सीन के जल्द से जल्द आयात की तैयारियों में जुट गईं। भारत सरकार के प्रयासों से स्पुतनिक वैक्सीन को समय पर हरी झंडी भी मिल गई। रूस वैक्सीन की दो खेप भेजने के साथ-साथ तकनीक का हस्तांतरण भी कर चुका है। बहुत जल्द हमारी कंपनियां वैक्सीन का निर्माण शुरू कर देंगी।
केंद्र ने वैश्विक स्तर पर उपलब्ध टीकों को मंजूरी नहीं दी है। केंद्र सरकार ने अप्रैल में ही देश में उन वैक्सीन के प्रवेश और इस्तेमाल की प्रक्रिया को आसान बना दिया है, जिन्हें अमेरिकी एजेंसी एफडीए, ईएमए, ब्रिटेन की एमएचआरए और जापान की पीएमडीए और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की आपातकालीन उपयोग सूची में शामिल किया जा चुका है। इन टीकों को पूर्व की तरह ब्रिजिंग परीक्षणों से गुजरने की जरूरत नहीं होगी। फिलहाल, किसी भी विदेशी वैक्सीन निर्माता का कोई आवेदन औषधि नियंत्रक के पास लंबित नहीं है।
केंद्र टीकों के घरेलू उत्पादन में तेजी लाने के लिए उचित प्रयास नहीं कर रहा है। केंद्र सरकार वर्ष 2020 की शुरुआत से ही अधिक से अधिक कंपनियों को वैक्सीन उत्पादन में सक्षम बनाने के लिए सूत्रधार की भूमिका निभा रही है। सिर्फ एक भारतीय कंपनी (भारत बायोटेक) के पास आइपी (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) है। केंद्र सरकार ने सुनिश्चित किया है कि भारत बायोटेक अपनी उत्पादन क्षमता में इजाफा तो करेगी ही, साथ-साथ तीन अन्य कंपनियां व संयंत्र भी कोवैक्सीन का उत्पादन शुरू करेंगी। भारत बायोटेक कोवैक्सीन का उत्पादन अक्टूबर तक एक करोड़ से बढ़ाकर 10 करोड़ प्रति माह करने जा रही है। इसके अलावा तीनों सार्वजनिक उपक्रमों के लिए दिसंबर तक चार करोड़ खुराक उत्पादन लक्ष्य तय किया गया है।
सीरम इंस्टीट्यूट कोविशील्ड का उत्पादन 6.5 करोड़ से बढ़ाकर 11 करोड़ खुराक प्रति माह कर रही है। भारत सरकार यह भी सुनिश्चित कर रही है कि स्पुतनिक वैक्सीन का निर्माण समन्वय के साथ छह कंपनियों द्वारा किया जाए। केंद्र सरकार जायडस कैडिला, बायोई के साथ-साथ जेनोवा के स्वदेशी टीकों के लिए वित्तीय मदद के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में तकनीकी सहायता भी उपलब्ध करा रही है। भारत बायोटेक की एक खुराक वाली इंट्रानेजल (नाक से दी जाने वाली) वैक्सीन के विकास का काम भी सरकार की वित्तीय मदद के साथ बेहतर रूप से आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2021 के अंत तक हमारे वैक्सीन उद्योग द्वारा 200 करोड़ से अधिक खुराक के उत्पादन का अनुमान है। यह दुनिया के कई देशों के लिए महज सपना हो सकता है।
कुछ लोगों का मानना है कि केंद्र को अनिवार्य लाइसेंसिंग लागू करनी चाहिए। अनिवार्य लाइसेंसिंग बहुत आकर्षक विकल्प नहीं है। यह अधिक मायने रखने वाला फॉर्मूला भी नहीं है। तकनीक का हस्तांतरण एक कुंजी है और यह उस कंपनी के अधिकार में होती है, जिसने उसका अनुसंधान और विकास किया है। वास्तव में हम अनिवार्य लाइसेंसिंग से एक कदम आगे बढ़ चुके हैं और कोवैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए भारत बायोटेक और तीन अन्य संस्थाओं के बीच सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं। स्पुतनिक के लिए भी ऐसा ही किया जा रहा है। जरा सोचिए मॉडर्ना ने अक्टूबर 2020 में कहा था कि वह अपनी वैक्सीन बनाने वाली किसी भी दूसरी कंपनी पर मुकद्दमा नहीं करेगी। इसके बावजूद एक भी कंपनी अब तक मॉडर्ना की वैक्सीन नहीं बना सकी है। इससे पता चलता है कि लाइसेंसिंग बेहद छोटी समस्या है। अगर वैक्सीन बनाना इतना आसान होता तो विकसित देशों में भी उसकी खुराक की इतनी कमी क्यों होती?
केंद्र सरकार सारे बड़े काम कर रही है। इनमें वैक्सीन निर्माताओं को फंडिंग से लेकर उन्हें भारत में वैक्सीन आपूर्ति के लिए उत्पादन में तेजी लाने की शीघ्र मंजूरी देने जैसे काम शामिल हैं। केंद्र द्वारा खरीदा गया टीका लोगों को मुफ्त में लगाने के लिए राज्यों को दिया जाता है। यह सब राज्यों की जानकारी में है। भारत सरकार ने केवल राज्यों को उनके अनुरोध के बाद खुद टीकों की खरीद का प्रयास करने के लिए सक्षम बनाया है। भारत सरकार ने जनवरी से अप्रैल तक संपूर्ण टीकाकरण कार्यक्रम का संचालन किया और मई की स्थिति की तुलना में वह काफी बेहतर रहा। लेकिन जो राज्य इन तीन महीनों में स्वास्थ्य कर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कार्मिकों के टीककरण में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके वे टीकाकरण की प्रक्रिया का विस्तार और विकेंद्रीककरण चाहते थे।
स्वास्थ्य राज्य का विषय है और उदारीकृत टीका नीति राज्यों द्वारा उन्हें अधिक अधिकार देने के लिए किए जा रहे लगातार अनुरोधों का ही परिणाम थी। सच्चाई यह है कि उनकी वैश्विक निविदाओं का कोई परिणाम नहीं निकला। यह इस बात की भी पुष्टि करता है कि दुनियाभर में टीके की कमी है और उसे कम समय में खरीदना आसान नहीं है। यही बात हम राज्यों को पहले दिन से बता रहे हैं। केंद्र राज्यों को तय दिशा-निर्देशों के अनुसार पारदर्शी तरीके से पर्याप्त वैक्सीन आवंटित कर रहा है। सच्चाई यह है कि राज्यों को वैक्सीन की उपलब्धता के बारे में पहले से ही सूचित किया जा रहा है। जल्द ही वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ने वाली है। इसके बाद अधिक आपूर्ति संभव हो सकेगी।
साल के अंत तक वैक्सीन के 200 करोड़ डोज का होगा उत्पादन, वैक्सीन निर्माताओं के साथ संपर्क में सरकार
जैसा कि हमारे अपने वैक्सीन निर्माताओं ने भी देश के लिए किया है। फाइजर ने जैसे ही वैक्सीन की उपलब्धता का संकेत दिया, केंद्र सरकार और कंपनी वैक्सीन के जल्द से जल्द आयात की तैयारियों में जुट गईं। भारत सरकार के प्रयासों से स्पुतनिक वैक्सीन को समय पर हरी झंडी भी मिल गई। रूस वैक्सीन की दो खेप भेजने के साथ-साथ तकनीक का हस्तांतरण भी कर चुका है। बहुत जल्द हमारी कंपनियां वैक्सीन का निर्माण शुरू कर देंगी।
केंद्र ने वैश्विक स्तर पर उपलब्ध टीकों को मंजूरी नहीं दी है। केंद्र सरकार ने अप्रैल में ही देश में उन वैक्सीन के प्रवेश और इस्तेमाल की प्रक्रिया को आसान बना दिया है, जिन्हें अमेरिकी एजेंसी एफडीए, ईएमए, ब्रिटेन की एमएचआरए और जापान की पीएमडीए और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की आपातकालीन उपयोग सूची में शामिल किया जा चुका है। इन टीकों को पूर्व की तरह ब्रिजिंग परीक्षणों से गुजरने की जरूरत नहीं होगी। फिलहाल, किसी भी विदेशी वैक्सीन निर्माता का कोई आवेदन औषधि नियंत्रक के पास लंबित नहीं है।
केंद्र टीकों के घरेलू उत्पादन में तेजी लाने के लिए उचित प्रयास नहीं कर रहा है। केंद्र सरकार वर्ष 2020 की शुरुआत से ही अधिक से अधिक कंपनियों को वैक्सीन उत्पादन में सक्षम बनाने के लिए सूत्रधार की भूमिका निभा रही है। सिर्फ एक भारतीय कंपनी (भारत बायोटेक) के पास आइपी (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) है। केंद्र सरकार ने सुनिश्चित किया है कि भारत बायोटेक अपनी उत्पादन क्षमता में इजाफा तो करेगी ही, साथ-साथ तीन अन्य कंपनियां व संयंत्र भी कोवैक्सीन का उत्पादन शुरू करेंगी। भारत बायोटेक कोवैक्सीन का उत्पादन अक्टूबर तक एक करोड़ से बढ़ाकर 10 करोड़ प्रति माह करने जा रही है। इसके अलावा तीनों सार्वजनिक उपक्रमों के लिए दिसंबर तक चार करोड़ खुराक उत्पादन लक्ष्य तय किया गया है।
सीरम इंस्टीट्यूट कोविशील्ड का उत्पादन 6.5 करोड़ से बढ़ाकर 11 करोड़ खुराक प्रति माह कर रही है। भारत सरकार यह भी सुनिश्चित कर रही है कि स्पुतनिक वैक्सीन का निर्माण समन्वय के साथ छह कंपनियों द्वारा किया जाए। केंद्र सरकार जायडस कैडिला, बायोई के साथ-साथ जेनोवा के स्वदेशी टीकों के लिए वित्तीय मदद के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में तकनीकी सहायता भी उपलब्ध करा रही है। भारत बायोटेक की एक खुराक वाली इंट्रानेजल (नाक से दी जाने वाली) वैक्सीन के विकास का काम भी सरकार की वित्तीय मदद के साथ बेहतर रूप से आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2021 के अंत तक हमारे वैक्सीन उद्योग द्वारा 200 करोड़ से अधिक खुराक के उत्पादन का अनुमान है। यह दुनिया के कई देशों के लिए महज सपना हो सकता है।
कुछ लोगों का मानना है कि केंद्र को अनिवार्य लाइसेंसिंग लागू करनी चाहिए। अनिवार्य लाइसेंसिंग बहुत आकर्षक विकल्प नहीं है। यह अधिक मायने रखने वाला फॉर्मूला भी नहीं है। तकनीक का हस्तांतरण एक कुंजी है और यह उस कंपनी के अधिकार में होती है, जिसने उसका अनुसंधान और विकास किया है। वास्तव में हम अनिवार्य लाइसेंसिंग से एक कदम आगे बढ़ चुके हैं और कोवैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए भारत बायोटेक और तीन अन्य संस्थाओं के बीच सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं। स्पुतनिक के लिए भी ऐसा ही किया जा रहा है। जरा सोचिए मॉडर्ना ने अक्टूबर 2020 में कहा था कि वह अपनी वैक्सीन बनाने वाली किसी भी दूसरी कंपनी पर मुकद्दमा नहीं करेगी। इसके बावजूद एक भी कंपनी अब तक मॉडर्ना की वैक्सीन नहीं बना सकी है। इससे पता चलता है कि लाइसेंसिंग बेहद छोटी समस्या है। अगर वैक्सीन बनाना इतना आसान होता तो विकसित देशों में भी उसकी खुराक की इतनी कमी क्यों होती?
केंद्र सरकार सारे बड़े काम कर रही है। इनमें वैक्सीन निर्माताओं को फंडिंग से लेकर उन्हें भारत में वैक्सीन आपूर्ति के लिए उत्पादन में तेजी लाने की शीघ्र मंजूरी देने जैसे काम शामिल हैं। केंद्र द्वारा खरीदा गया टीका लोगों को मुफ्त में लगाने के लिए राज्यों को दिया जाता है। यह सब राज्यों की जानकारी में है। भारत सरकार ने केवल राज्यों को उनके अनुरोध के बाद खुद टीकों की खरीद का प्रयास करने के लिए सक्षम बनाया है। भारत सरकार ने जनवरी से अप्रैल तक संपूर्ण टीकाकरण कार्यक्रम का संचालन किया और मई की स्थिति की तुलना में वह काफी बेहतर रहा। लेकिन जो राज्य इन तीन महीनों में स्वास्थ्य कर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कार्मिकों के टीककरण में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके वे टीकाकरण की प्रक्रिया का विस्तार और विकेंद्रीककरण चाहते थे।
स्वास्थ्य राज्य का विषय है और उदारीकृत टीका नीति राज्यों द्वारा उन्हें अधिक अधिकार देने के लिए किए जा रहे लगातार अनुरोधों का ही परिणाम थी। सच्चाई यह है कि उनकी वैश्विक निविदाओं का कोई परिणाम नहीं निकला। यह इस बात की भी पुष्टि करता है कि दुनियाभर में टीके की कमी है और उसे कम समय में खरीदना आसान नहीं है। यही बात हम राज्यों को पहले दिन से बता रहे हैं। केंद्र राज्यों को तय दिशा-निर्देशों के अनुसार पारदर्शी तरीके से पर्याप्त वैक्सीन आवंटित कर रहा है। सच्चाई यह है कि राज्यों को वैक्सीन की उपलब्धता के बारे में पहले से ही सूचित किया जा रहा है। जल्द ही वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ने वाली है। इसके बाद अधिक आपूर्ति संभव हो सकेगी।


