फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह का 91 साल की उम्र में कोरोना से निधन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जताया शोक

चंडीगढ़ : वैसे तो मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में सब कुछ हासिल किया, लेकिन उनका एक सपना अधूरा रह गया और वह इस अधूरे सपने के साथ जिंदगी को अलविदा कर गए।उड़न सिख पद्मश्री मिल्खा सिंह अक्सर कहते थे कि रोम ओलंपिक जाने से पहले उन्होंने दुनिया भर में कम से कम 80 दौड़ों में हिस्सा लिया था, इनमें उन्होंने 77 दौड़ें जीतीं थी, जो एक रिकार्ड बन गया था।

वह बताते थे कि सारी दुनिया ये उम्मीदें लगा रही थी कि रोम ओलंपिक में 400 मीटर की दौड़ मिल्खा ही जीतेगा। मैं अपनी गलती की वजह से पदक नहीं जीत सका। मैं इतने वर्षों से इंतजार कर रहा हूं कि कोई दूसरा भारतीय वह कारनामा कर दिखाए, जिसे करते-करते मैं चूक गया था, लेकिन कोई एथलीट ओलंपिक में पदक नहीं जीत पाया।

एथलीटों को चाहिए कोई एक रोल माडल : मिल्खा सिंह कहते थे कि अगर रोम ओलंपिक में पदक जीत जाता तो आज देश में जमैका की तरह हर घर से एथलीट निकलते। मैं रोम में पदक जीतने से नहीं चूका, बल्कि मैं इस देश को रोल माडल और सपने देने से चूक गया था। पीटी ऊषा और श्रीराम सिंह जैसे एथलीट भी पदक जीतने से चूक गए, जिनसे देश को खासी उम्मीदें थीं। अगर हम पदक जीत गए होते तो एथलेटिक्स गेम्स के प्रति भी युवाओं में वो ही आकर्षण होता जो ध्यानचंद के समय हाकी का और वर्ष 1983 में क्रिकेट विश्व कप जीतने के बाद क्रिकेट का था। मैं इतने वर्षों से इंतजार कर रहा, लेकिन मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ।

एथलेटिक्स को भी मिले क्रिकेट की तरह तव्वजो : मिल्खा सिंह अक्सर हर मंच से यह शिकायत करते थे कि क्रिकेट सिर्फ 10 से 14 देश खेलते हैं, बावजूद इसके उसे मीडिया की तरफ से ज्यादा कवरेज दी जाती है, लेकिन एथलेटिक्स गेम्स 200 से ज्यादा देश खेलते हैं, उस लिहाज से एथलेटिक्स गेम्स को तव्वजो नहीं दी जाती है। इसलिए एथलेटिक्स में महत्व को हमें समझना होगा। मिल्खा सिंह को टोक्यो ओलंपिक में एथलीट हिमा दास से खासी उम्मीदें थीं। इस बाबत उन्होंने उन्हें तैयारी के टिप्स भी दिए थे। 

Share this with Your friends :

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter