क्रोध के आवेग मेें सब कुछ नष्ट हो जाता है, इससे बचना जरुरी -मुनिश्री
दतिया. व्यक्तित्व के विकास में क्रोध अवरोधक बनता है। क्रोध से व्यक्तित्व का हास होता है। क्रोध घर परिवार, जीवन को नरक बना देता है। व्यक्तित्व विकास तो स्वर्ग की और ले जाने वाला है। जहां सह्रदयता, प्रेम, वात्सलय, क्षमा दया हो। वहां अपने आप व्यक्तित्व विकास होने लगता है। यह विचार क्रांतिकारी मुनिश्री प्रतीक सागर ने शुक्रवार को सोनागिर स्थित आचार्यश्री पुप्षदंत सागर सभागृह में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहाकि क्रोध का अर्थ है प्रतिकूल स्थिति में आने वाला आवेग । जब हमारे जीवन मे प्रतिकूल परिस्थिति बनती है तो आवेग आ जाता है उसे क्रोध कहते है। इससे बचना बहुत जरूरी है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है प्रतिकूल परिस्थितियों मे मनः स्थिति को एक साथ बनाए रखें । जिसकी मन की स्थिति एक सी बनी रहती है। वह क्रोध का निमित्त बनता है तो अविरल रूप से बच जाता है। अतः प्रत्येक परिस्थिति का सामना शान्तिपूर्ण ढंग से करें। दूसरा उपाय आत्म निरीक्षण है। मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जब इस संसार में जन्म लेता है तब वह पूर्णत: निष्पाप, निष्कपट और राग-द्वेष से रहित होता है, लेकिन वह समाज के प्रदूषित माहौल और कुसंगति के चलते दूषित कामनाओं के जाल में उलझ जाता है। ऐसी दूषित कामनाएं ही मनुष्य को पाप की और अग्रसर करती हैं। महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है कि कामना ही बंधन है और दूसरा कोई बंधन नहीं है। जो कामना के बंधन से छूट जाता है वह ईश्वरानुभूति करने में समर्थ हो जाता है।

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