नई दिल्ली : केंद्र सरकार की तरफ से फिलहाल पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती के आसार नहीं दिख रहे हैं। इसकी मुख्य वजह है कि केंद्र सरकार हर साल आयल कंपनियों के भारी-भरकम कर्ज को उतारने में लगी है।
यह कर्ज यूपीए सरकार के कार्यकाल में आयल बांड के रूप में लिया गया था। यूपीए के कार्यकाल में कच्चे तेल के दाम तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते रहे, लेकिन उस अनुपात में तेल की खुदरा कीमत नहीं बढ़ाई गई।
इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार पर आयल कंपनियों का कर्ज बढ़ता गया। इस बारे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि वर्ष 2014-15 से सरकार आयल कंपनियां का कर्ज चुका रही है। उस समय से लेकर अब तक सिर्फ ब्याज के रूप में सरकार आयल कंपनियों को 70,195.72 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुकी है।
चालू वित्त वर्ष से लेकर वर्ष 2025-26 के दौरान आयल कंपनियों को अभी और 37,340 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में देगी। उन्होंने बताया कि इस मद में बकाया मूलधन 1,30,923.17 करोड़ रुपये का है। वित्त मंत्री ने कहा कि यूपीए के जमाने में तेल के जो दाम कम किए गए, उसकी कीमत सरकार अभी चुका रही है।
तेल की खुदरा कीमत पर केंद्र के उत्पाद शुल्क में कटौती के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि तेल एक काफी कठिन मसला है। वित्त मंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था रिकवर कर रही है और उसे सहारा देने के लिए संसद के गत सत्र में कई महत्वपूर्ण बिल लाए गए। लेकिन विपक्ष की तरफ से इन बिलों पर चर्चा के लिए आगे नहीं आना काफी दुखद है।
उन्होंने कहा कि इन बिलों पर विपक्ष को चर्चा करना चाहिए था, सरकार को घेरना चाहिए था। महंगाई होगी कम सीतारमण ने कहा कि महंगाई अब नियंत्रण में रहेगी क्योंकि आवश्यक वस्तुओं पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई सुचारू हो रही है और धीरे-धीरे यह सामान्य हो जाएगी। उन्होंने कहा कि महंगाई समय रहते कम हो जाएगी।


