अफगानिस्तान में तालिबान संकट के खतरे बता पीएम मोदी बोले- भारत जैसे पड़ोसियों पर सबसे ज्यादा असर
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नई दिल्ली : अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के तकरीबन 33 दिन बाद भारत ने यह स्टैंड ले लिया है कि वह अपने दीर्घकालिक हितों को देखते हुए एक कट्टरवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले देशों में शामिल नहीं होगा।

भारत के इस रुख को पीएम नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की दुशांबे (ताजिकिस्तान) में चल रही शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए सामने रखा।

पीएम मोदी ने दो टूक कहा कि अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन समावेशी नहीं है और इससे नई व्यवस्था की स्वीकार्यता पर सवाल उठता है। उन्होंने वैश्विक समुदाय को भी सलाह दिया कि तालिबान को मान्यता देने पर सोच विचार कर फैसला होना चाहिए क्योंकि इससे पूरी दुनिया में उग्रवादी हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है।

तालिबान को लेकर भारत का यह कड़ा रुख तब सामने आया है जब एससीओ के ही तीन बड़े सदस्य देश चीन, पाकिस्तान और रूस तालिबान की सत्ता को मान्यता देने को लेकर विमर्श कर रहे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि तालिबान की सत्ता को मान्यता देने को लेकर वैश्विक चेतावनी देने वाला भारत पहला देश बन गया है।

कई देशों ने तालिबान के रवैये व इसकी सरकार में दूसरे वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का मुद्दा उठाया है लेकिन भारत ने इसके खिलाफ एक वैश्विक मत बनाने का काम किया है। एससीओ की दिन भर चली बैठक में पीएम मोदी ने दो बार वर्चुअल तरीके से संबोधित किया।

पहले उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, पाकिस्तान के पीएम इमरान खान, ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमामोली राहमोन के अलावा कजाखस्तान, किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपतियों के समक्ष अफगानिस्तान के मुद्दे को उठाया और फिर बाद में एससीओ और सीएसटीओ (कलेक्टिव सिक्यूरिटी ट्रिटी आर्गेनाइजेशन) की आउटरीच शिखर सम्मेलन में समग्रता के साथ उठाया। विदेश मंत्री एस जयशंकर इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए दुशांबे में है।

पीएम मोदी का यह भाषण तालिबान की सत्ता के साथ दोस्ती गांठ रहे रूस, चीन व पाकिस्तान को एक संकेत भी है। पीएम मोदी ने कहा कि अफगानिस्तान के हाल के घटनाक्रम का सबसे अधिक प्रभाव हम जैसे पड़ोसी देशों पर होगा। इस मुद्दे पर क्षेत्रीय सहयोग बहुत जरूरी है। उन्होंने इस संदर्भ में चार तथ्य रखें हैं।

पहला, अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन समावेशी (इनक्लूसिव) नहीं है और इसके लिए कोई वार्ता नहीं हुई है। मोदी ने कहा कि ‘इससे नई व्यवस्था की स्वीकार्यता पर सवाल उठता है। यह आवश्यक है कि नई व्यवस्था की मान्यता पर फैसला वैश्विक समुदाय सोच-समझ कर और सामूहिक तौर पर ले। इस मुद्दे पर भारत संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका का समर्थन करता है।’

अफगानिस्तान में अस्थिरता व कट्टरवाद के बने रहने और इसका पूरी दुनिया में आतंकवादी व कट्टरवादी विचारधारा को बढ़ावा मिलने को उन्होंने दूसरा तथ्य बताया। मोदी ने आगाह किया, ‘अन्य उग्रवादी समूहों को हिंसा के माध्यम से सत्ता पाने का प्रोत्साहन मिल सकता है।’ ऐसे में सभी देशों को मिल कर सुनिश्चित करना चाहिए कि अफगानिस्तान की धरती का उपयोग किसी भी देश में आतंकवाद फैलाने के लिए न हो।

उन्होंने एससीओ सदस्यों पर भी यह जिम्मेदारी डाली कि वे इसको लेकर नियम बनाएं और ये नियम आतंकवाद के प्रति जीरो टालेरेंस के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। इसमें सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा व आतंकवाद को वित्तीय मदद देने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने के नियम भी होने चाहिए।

साथ ही इसे कैसे लागू किया जाए, इसकी प्रणाली भी होनी चाहिए। मादक पदार्थों पर चिंता तीसरा विषय पीएम मोदी के मुताबिक अफगानिस्तान में मादक पदार्थों, अवैध हथियारों व मानव तस्करी से संबंधित है। अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर अत्याधुनिक हथियारों से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता के खतरे से भी भारत ने सभी देशों को आगाह किया।

अफगानों के लिए मदद का भरोसा चौथा तथ्य पीएम मोदी ने अफगानिस्तान के मानवीय संकट को बताया और कहा कि भारत अफगानिस्तानी नागरिकों को खाद्य सामग्री, दवाइयां आदि पहुंचाने को तैयार है। इसके लिए भी उन्होने वैश्विक समुदाय को साथ मिल कर काम करने का आग्रह किया।

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