चंडीगढ़ : पंजाब कांग्रेस में जारी अंतर्कलह को शांत करने के लिए हाईकमान ने राज्य में न केवल पार्टी बल्कि सरकार का चेहरा भी बदल दिया है, लेकिन मुसीबत कम नहीं हो रही है। खास तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर के तेवर ने हाईकमान की चिंता बढ़ा दी है। एक दिन पहले हाईकमान पर उनकी टिप्पणियों के बाद पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने राजनीति में गुस्से की जगह नहीं होने की सलाह दी तो कैप्टन का पलटवार और तीखा रहा।
उनका कहना था कि गुस्सा नहीं तो क्या जलालत की जगह है? मालूम हो कि कैप्टन अमरिंदर सिंह लगातार कोई बड़ा कदम उठाने के संकेत दे रहे हैं। गुरुवार को उनका बयान सुप्रिया श्रीनेत की सलाह पर आया। दरअसल, सुप्रिया ने कहा कि राजनीति में गुस्सा, द्वेष, व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी और उससे बदला लेने की कोई जगह नहीं।
उम्मीद है कि कैप्टन अपनी कही हुई बातों पर समझदारी दिखाते हुए जरूर पुनर्विचार करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई पार्टी छोड़कर जाना चाहता है, उस पर वह कोई टिप्पणी नहीं करेंगी। इस पर कैप्टन खुद तो सामने नहीं आए, लेकिन उनके मीडिया सलाहकार रहे रवीन ठुकराल ने पलटवार किया।
ठुकराल ने कैप्टन की तरफ से ट्वीट कर सवाल किया कि यह ठीक है कि राजनीति में गुस्से की जगह नहीं, लेकिन क्या जलालत की जगह है? अगर मेरे जैसे वरिष्ठ नेता के साथ ऐसा हो सकता है, तो कार्यकर्ताओं के साथ क्या होगा? गौरतलब है कि एक दिन पहले ही कैप्टन ने चुनौती दी थी कि वह नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे। साथ ही, सलाह दी कि अगर सिद्धू ‘सुपर सीएम’ की तरफ काम करेंगे तो पार्टी काम नहीं कर पाएगी।
कैप्टन के लिए विकल्प खुले, लेकिन संभावनाएं सीमित
1. कांग्रेस में रह कर सिद्धू को चुनौती कैप्टन कांग्रेस में ही रहकर नवजोत सिंह सिद्धू को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है। बुधवार को कैप्टन ने जिस तरह राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और सिद्धू को पर तीखे हमले किए हैं, उसके बाद इसके आसार बहुत कम हैं। शायद वह यही चाह रहे हैं कि पार्टी से उन्हें निकाल दिया जाए और वह राजनीति का विक्टिम कार्ड खेल सकें।
2. नई पार्टी का गठन कैप्टन के ओएसडी रहे नरेंद्र भांबरी ने बुधवार को इंटरनेट मीडिया पर पोस्टर शेयर कर लिखा था, ‘2022-कैप्टन फिर लौटेंगे।’ इसके बाद कैप्टन के नई पार्टी बनाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। परंतु 79 साल के कैप्टन के लिए यह चुनौती से कम नहीं होगा, क्योंकि कांग्रेस के अधिकतर नेता हाईकमान के साथ जा सकते हैं।
3. अलग फ्रंट अमरिंदर सिंह अलग फ्रंट बना सकते हैं। वह शिअद व आप से अलग हुए नेताओं को इकट्ठा कर सकते हैं। सुखदेव सिंह ढींडसा सहित अकाली दल से अलग हुए अन्य नेताओं की पहुंच सीमित क्षेत्र तक है। कैप्टन के इन नेताओं के साथ अच्छे संबंध भी हैं। ये नेता कैप्टन के नेतृत्व को स्वीकार कर सकते हैं।
4. भाजपा का साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ कैप्टन के अच्छे संबंध हैं। कैप्टन ने भाजपा के साथ जाने को लेकर भले कभी हां नहीं की लेकिन इन्कार भी नहीं किया।
परंतु किसान आंदोलन एक बड़ा मुद्दा है और इसके हल के बिना कैप्टन का भाजपा में जाना संभव नहीं है। इस मुद्दे का समाधान करवाकर कैप्टन भाजपा में जा सकते हैं। भाजपा नेता उन्हें पार्टी में आने का न्योता भी दे रहे हैं। 5. आप से मेल नहीं खाते विचार कांग्रेस पार्टी छोड़ना कैप्टन के लिए कोई बड़ी समस्या नहीं है।
1984 में अमृतसर स्थित श्री हरिमंदिर साहिब पर सैन्य कार्रवाई के विरोध में भी उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद वह 13 वर्षों तक अकाली दल के साथ रहे। आम आदमी पार्टी से जुड़ने पर कैप्टन विचार भी नहीं कर सकते, क्योंकि अरविंद केजरीवाल से उनके विचार बिल्कुल नहीं मिलते। वे कई बार ट्विटर पर आमने-सामने हो चुके हैं।


