छोटे और मझोले उद्योगों को बड़ा सहारा : कैबिनेट ने ₹10,000 करोड़ के ‘एसएमई ग्रोथ फंड’ को दी मंजूरी, सीधे इक्विटी निवेश से मिलेगा विस्तार

नई दिल्ली। देश के लघु एवं मध्यम उद्यमों (SME) को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने और उनके विस्तार के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लघु एवं मध्यम उद्यमों में प्रत्यक्ष इक्विटी निवेश के लिए ₹10,000 करोड़ के ‘एसएमई विकास कोष’ (SME Growth Fund – SGF) की स्थापना को आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है।

​यह पहल केंद्रीय बजट में घोषित उन सुधारों के अनुरूप है, जिनका उद्देश्य एमएसएमई इकोसिस्टम को केवल कर्ज तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक जोखिम पूंजी (इक्विटी), नकदी और रणनीतिक सहायता उपलब्ध कराना है। फंड के जरिए मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस, आधुनिक टेक्नोलॉजी और इनोवेशन संचालित क्षेत्रों की उच्च क्षमता वाली इकाइयों को सीधे आर्थिक संबल दिया जाएगा।

इक्विटी फंडिंग की पुरानी कमी होगी दूर

​अब तक सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए संचालित अधिकांश सरकारी योजनाएं शुरुआती दौर (स्टार्टअप्स) या केवल माइक्रो यूनिट्स पर केंद्रित रहती थीं:

  • ​ग्रोथ कैपिटल की कमी: जो मध्यम और लघु उद्योग अपने कारोबार का दायरा बढ़ाना चाहते हैं, नई मशीनरी लाना चाहते हैं या वैश्विक बाजार में उतरना चाहते हैं, उन्हें दीर्घकालिक इक्विटी पूंजी जुटाने में संरचनात्मक दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
  • ​सीधे इक्विटी में भागीदारी: एसएमई ग्रोथ फंड इसी कमी को पाटने के लिए तैयार किया गया है। इसके जरिए सरकार वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) ढांचे के तहत ₹10,000 करोड़ का निवेश कर कंपनियों की विकास पूंजी में सीधी हिस्सेदारी लेगी।

​टियर-2 और टियर-3 शहरों के औद्योगिक क्लस्टर्स पर मुख्य फोकस

​फंड के आवंटन और प्राथमिकता को लेकर स्पष्ट रूपरेखा तय की गई है:

  • ​मैन्युफैक्चरिंग को प्राथमिकता: फंड की अधिकांश राशि विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Units) से जुड़े लघु एवं मध्यम उद्योगों को दी जाएगी।
  • ​छोटे शहरों का औद्योगिक विकास: टियर-II और टियर-III शहरों में फैले औद्योगिक क्लस्टर्स को इसमें खास प्राथमिकता मिलेगी, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन दूर होगा और स्थानीय स्तर पर कुशल रोजगार के नए अवसर बनेंगे।
  • ​वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ाव: इस पूंजी की मदद से भारतीय उद्यम उन्नत तकनीक अपना सकेंगे, उत्पादन क्षमता का विस्तार करेंगे और अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत कर सकेंगे।

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