लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में राज्य सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सराहना मिली है। प्रदेश में सहकारी तंत्र के सशक्तिकरण का ही परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश में लगभग 42 हजार सहकारी समितियां पूरी सक्रियता के साथ कार्य कर रही हैं।
राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2025 को ‘सहकारिता महाकुंभ’ के रूप में मनाए जाने और सहकारिता को गांव-गांव तक विस्तार देने के लिए चलाए गए व्यापक अभियानों को ग्रामीण विकास का प्रभावी मॉडल बताया गया है।
गांव-गांव तक सहकारिता का अभूतपूर्व विस्तार:-
42 हजार सक्रिय समितियां: प्रदेशभर में पैक्स (PACS), दुग्ध समितियां, मत्स्य समितियां और महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 42,000 से अधिक सहकारी संस्थाएं जमीनी स्तर पर किसानों और पशुपालकों को वित्तीय व तकनीकी संबल प्रदान कर रही हैं।
‘सहकारिता महाकुंभ’ का दूरगामी प्रभाव: वर्ष 2025 में आयोजित ‘सहकारिता महाकुंभ’ के जरिए प्रदेश के प्रत्येक राजस्व ग्राम तक सहकारी मॉडल को पहुंचाया गया, जिससे करोड़ों ग्रामीण परिवार सीधे औपचारिक बैंकिंग और सहकारी सेवाओं से जुड़े।
डिजिटलीकरण और पारदर्शिता: पैक्स के कंप्यूटरीकरण और पारदर्शी व्यवस्था लागू होने से खाद, बीज, कृषि यंत्रों की उपलब्धता और ऋण वितरण की प्रक्रिया में बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हुई है।
‘सहकार से समृद्धि’ विजन को मिला नया धरातल : केंद्र सरकार के ‘सहकार से समृद्धि’ के संकल्प को धरातल पर उतारने में उत्तर प्रदेश अग्रणी भूमिका निभा रहा है। बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (M-PACS) के माध्यम से गांवों में जन औषधि केंद्र, सीएससी (CSC) और कस्टम हायरिंग सेंटर्स का संचालन शुरू किया गया है। इससे न केवल किसानों की आय में इजाफा हुआ है, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए गांवों में ही स्वरोजगार के नए द्वार खुले हैं।

