चंबल के कछुए बने गंगा के ‘प्राकृतिक सफाई योद्धा’ : नमामि गंगे मिशन में निभा रहे अहम भूमिका, जल गुणवत्ता में दिख रहा सुधार

भोपाल  : नदियों की स्वच्छता और जैव-विविधता संरक्षण की दिशा में एक अनोखा और प्रभावी प्रयोग सामने आया है, जिसमें चंबल नदी के दुर्लभ कछुए अब गंगा की सफाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ‘नमामि गंगे मिशन’ के तहत इन कछुओं को गंगा नदी में छोड़कर प्राकृतिक तरीके से प्रदूषण कम करने का प्रयास किया जा रहा है। खास बात यह है कि ये कछुए नदी में मौजूद जैविक कचरे और मृत अवशेषों को खाकर पानी को स्वच्छ बनाए रखने में मदद कर रहे हैं, जिससे इन्हें ‘प्राकृतिक सफाई योद्धा’ के रूप में देखा जा रहा है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस पहल को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि जलीय जीवों के संरक्षण से पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार जल स्रोतों और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है। कछुओं के संरक्षण और पुनर्वास से न केवल नदियों की स्वच्छता बढ़ेगी, बल्कि मध्यप्रदेश को वन्यजीव संरक्षण और इको-टूरिज्म के क्षेत्र में नई पहचान भी मिलेगी।

नमामि गंगे मिशन से जुड़ा अनोखा प्रयोग
नमामि गंगे मिशन के तहत चंबल में संरक्षित दुर्लभ कछुओं को गंगा नदी में छोड़ने की पहल की गई है। इसी क्रम में अप्रैल 2025 में ‘रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल’ (बटागुर प्रजाति) के 20 कछुओं को उत्तर प्रदेश के हैदरपुर वेटलैंड और गंगा की मुख्य धारा में छोड़ा गया था। यह प्रयोग अब सकारात्मक परिणाम देता नजर आ रहा है।

कैसे करते हैं कछुए प्राकृतिक सफाई
विशेषज्ञों के अनुसार कछुए नदी की सफाई में कई स्तरों पर मददगार साबित होते हैं—

● ये मांसाहारी होते हैं और सड़े-गले जैविक पदार्थों व मृत जीवों को खाकर पानी को प्रदूषित होने से बचाते हैं।
● जलीय पारिस्थितिकी में संतुलन बनाए रखते हैं, जिससे जल की गुणवत्ता बेहतर होती है।
● ऐसे जैविक कचरे को भी खत्म कर देते हैं, जिसे मशीनों से हटाना कठिन होता है।

जल गुणवत्ता में सुधार के संकेत
सरकारी आकलनों के अनुसार गंगा के कई हिस्सों में जल गुणवत्ता में सुधार दर्ज किया गया है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) और फीकल कोलीफॉर्म (FC) स्तर में कमी आई है, जो स्वच्छता का संकेत है। वाराणसी और पटना जैसे प्रमुख शहरों में भी प्रदूषण स्तर में गिरावट देखी गई है, जबकि डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (DO) स्तर जलीय जीवन के लिए अनुकूल पाया गया है।

‘जलीय योद्धा’ बनकर उभरे चंबल के कछुए
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में पाए जाने वाले बटागुर और अन्य दुर्लभ प्रजातियों के कछुए अब गंगा पुनर्जीवन अभियान का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इन्हें ‘जलीय योद्धा’ के रूप में देखा जा रहा है, जो अपनी प्राकृतिक क्षमता से नदी को स्वच्छ और जीवंत बनाए रखने में योगदान दे रहे हैं।

चंबल में पाई जाती हैं दुर्लभ प्रजातियां
चंबल नदी में कछुओं की कुल नौ दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें बटागुर, बटागुर डोंगोका, साल कछुआ, धमोक, चौड़, मोरपंखी, कटहेवा, पचेड़ा और इंडियन स्टार कछुआ शामिल हैं। ये सभी प्रजातियां जलीय पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस पहल को विशेषज्ञ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक टिकाऊ और प्राकृतिक समाधान मान रहे हैं। आने वाले समय में यदि इस मॉडल को और व्यापक स्तर पर लागू किया जाता है, तो यह देश की अन्य नदियों की स्वच्छता के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।

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