Datia News : दतिया । सूर्य पुत्र शनि जयंती ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि गुरुवार 10 जून को रोहिणी नक्षत्र में मनाई जाएगी। इस दिन शनि देव की विशेष पूजा का विधान है। शनि जयंती पर स्थानीय करण सागर स्थित 33 कोटि मंदिर में विराजित शनि देव के मंदिर तथा पीतांबरा पीठ मंदिर के सामने स्थित शनिमंदिर पर विशेष पूजा पाठ तथा तेल से अभिषेक किया जाएगा। कोरोना गाइड के चलते मंदिर में सिर्फ पंडित ही पूजा-पाठ करेंगे।
जानकारी के अनुसार अमावस्या तिथि 9 जून को 13:57 बजे से प्रारम्भ होकर 10 जून 16:21 बजे समाप्त होगी। ज्योतिषाचार्य पंडित उमेश शर्मा ने बताया कि शनिदेव सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। शनि देव को कर्मफल दाता व न्याय का देवता भी कहा जाता है। शनिदेव ने भगवान शंकर की घोर तपस्या की, शनिदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने शनिदेव को वरदान दिया कि तुम नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ होगे। तुम पृथ्वीलोक के न्यायाधीश और दंडाधिकारी रहोगे। तुम ही लोगों को कर्मों के अनुसार न्याय और दंड दोगे।
शनि देव को प्रसन्न करने के लिए करें यह अचूक उपाय
शनिदेव की पूजा करने से, उनके निमित्त उपाय करने से शनिदेव बहुत जल्दी खुश होते हैं। साथ ही जन्मपत्रिका में अशुभ शनि के प्रभाव से होने वाली परेशानियों, जैसे शनि की साढे-साती, ढैय्या और कालसर्प योग से भी छुटकारा मिलता है। चूंकि शनि न्याय के देवता है, अत: अच्छे कर्म को राजा और बुरे कर्म करने वालों को कष्ट देते है। शनि जयंती के दिन किया गया दान पुण्य एवं पूजा पाठ शनि संबंधी सभी कष्टों को दूर करता है।
– जिन जातकों को साढ़े साती चल रही है उन्हें शनि की कृपा एवं शांति प्राप्ति हेतु तिल, उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, आचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए।
-शनि देव को प्रसन्न करने के लिए हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए।
– शनि के लिए दान में दी जाने वाली वस्तुओं में काले कपडे़, जामुन, काली उडद, काले जूते, तिल, लोहा, तेल, आदि वस्तुओं को शनि के निमित्त दान में दे सकते हैं।

अखंड सौभाग्य के लिए सुहागिन करेंगी वटवृक्ष की पूजा
गुरूवार को वट सावित्री ब्रत शहर में पूजा पाठ के साथ शुरू होगा। इसमें जहां वट वृक्ष के सूत से बांधने के साथ अखंड सौभाग्य की कामना करेंगी। वट सावित्री ब्रत में वट वृक्ष की पूजा का विधान भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा का एक प्रतीक है और इसके द्वारा वृक्षों के औषधीय महत्व व देव स्वरूप का भी बोध होता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज तिवारी के अनुसार भविष्य उत्तर पुराण तथा स्कंद पुराण में यह पर्व जेठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है वट सावित्री ब्रत पति की लंबी आयु, सौभाग्य, संतान की प्राप्ति की कामना के लिए किया जाता है। वट को बरगद भी कहते हैं इस वृक्ष में सकारात्मक ऊर्जा का भरपूर संचार रहता है। इसके सानिध्य में रहकर जो मनोकामनाएं की जाती हैं वे पूर्ण होती हैं।
शास्त्रों में पांच वट वृक्षों का महत्व अधिक है अक्षय वट, पंचवट, बंसीवट, गया वट ,और सिद्धि वट के बारे में कहा जाता है। उक्त पांचों वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में बंसीवट, गया में गया वट और उज्जैन में सिद्धि वट पवित्र है। पुराणों में वट वृक्ष के मूल में ब्रह्मा ,मध्य में विष्णु ,और अग्रभाग में शिव का वास माना गया है। वट वृक्ष लंबे समय तक अक्षय रहता है, इसलिए इसे अक्षय वट भी कहते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक भी है। क्योंकि इस वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ ने बुद्धत्व को प्राप्त किया था और वह बुद्ध कहलाए थे। आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी होता है वटवृक्ष। वातावरण को शीतलता एव शुद्धता प्रदान करता है। साथ ही यदि आसपास वट वृक्ष अथवा बरगद का कोई पेड़ ना हो तो निराश ना हो कहीं से एक बरगद की टहनी मांग कर घर पर पूजा कर सकते हैं। यदि यह भी ना हो सके तो दीवार पर वट वृक्ष का चित्र अंकित करके पूजा कर लें। पूजा आराधना में मुख्य महत्व भावना, श्रद्धा, विश्वास ,और आस्था का होता है। वास्तविक वट वृक्ष का पूजन और इस पूजन में कोई अंतर नहीं पड़ता। इस दिन मिट्टी से सावित्री, सत्यवान और भैंसे पर सवार यमराज की प्रतिमा बनाकर धूप, चंदन, दीपक, फल, रोली, केसर से पूजन करें और साथ ही सावित्री, सत्यवान की कथा सुननी चाहिए।


