ग्रहण और भद्राकाल के बीच होली का उत्सव ज्योतिषाचार्य ने बताईं जरूरी सावधानियां, जानिए क्या करें और क्या न करें
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धर्म : होली का पर्व सामान्यतः उल्लास, उमंग और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस वर्ष यह उत्सव एक विशेष खगोलीय संयोग के बीच मनाया जा रहा है। फाल्गुन पूर्णिमा पर पड़ रहे चंद्र ग्रहण और भद्राकाल की उपस्थिति ने होलिका दहन के मुहूर्त को लेकर विशेष चर्चा पैदा कर दी है। धर्माचार्यों और ज्योतिषविदों के अनुसार इस बार होलिका दहन और रंगोत्सव दोनों में पारंपरिक सावधानियों का पालन करना अधिक महत्वपूर्ण रहेगा।


ग्रहण और भद्राकाल का धार्मिक महत्व : हिंदू धर्मशास्त्रों में भद्राकाल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित समय माना गया है। मान्यता है कि भद्रा के प्रभाव में किए गए मांगलिक कार्य अपेक्षित फल नहीं देते। वहीं, चंद्र ग्रहण को भी आध्यात्मिक दृष्टि से संवेदनशील काल माना गया है। ग्रहण के दौरान सूतक लग जाता है, जिसके चलते पूजा-पाठ और शुभ अनुष्ठान स्थगित रखे जाते हैं।

ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि जब ग्रहण और भद्राकाल एक ही तिथि पर प्रभावी हों, तब विशेष रूप से पंचांग के आधार पर शुद्ध मुहूर्त का चयन करना चाहिए। होलिका दहन भद्रा समाप्ति और ग्रहण शुद्धि के बाद ही करना शास्त्रसम्मत माना गया है।


होलिका दहन के समय क्या रखें ध्यान : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। ऐसे में इसका मुहूर्त शुद्ध और दोषरहित होना आवश्यक माना जाता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि—

● भद्राकाल में होलिका दहन न करें।
● ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
● पूजा सामग्री पहले से तैयार रखें और ग्रहण काल में उसे स्पर्श न करें।
● ग्रहण के दौरान मंदिरों के पट बंद रखना परंपरागत नियमों के अनुरूप है।


ग्रहण काल में बरतें ये सावधानियां : ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि ग्रहण के समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि मानी जाती है। इस अवधि में भोजन नहीं करना चाहिए। यदि भोजन पहले से बना हो तो उसमें तुलसी दल या कुश डाल देना शास्त्रों में बताया गया है।

गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। उन्हें घर के भीतर रहकर विश्राम करने, धारदार वस्तुओं का उपयोग न करने और भगवान के नाम का स्मरण करने की परंपरा बताई गई है।

इसके अतिरिक्त, ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान, दान और मंत्रजाप करना पुण्यकारी माना गया है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा देने से ग्रहण दोष शांत होने की मान्यता है।


रंगोत्सव पर भी दिखेगा प्रभाव : जहां होलिका दहन के मुहूर्त में बदलाव संभव है, वहीं रंग खेलने की तिथि और समय भी स्थानीय पंचांगों के अनुसार निर्धारित किए जाएंगे। धर्माचार्यों का कहना है कि रंगोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाएं, लेकिन प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें और संयम बनाए रखें।

ग्रहण का समय और खगोलीय विवरण : भारतीय समयानुसार चंद्र ग्रहण की शुरुआत दोपहर 3:20 बजे होगी और इसका समापन शाम 6:48 बजे होगा। ग्रहण की पूर्ण अवस्था (समग्रता) शाम 4:34 बजे प्रारंभ होकर 5:33 बजे समाप्त होगी। इसकी तीव्रता 1.155 रहेगी।

यह खगोलीय घटना भारत के अधिकांश हिस्सों में दिखाई देगी। उत्तर-पूर्व भारत और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कुछ स्थानों को छोड़कर देश के अधिकांश क्षेत्रों में चंद्रोदय के समय ग्रहण दृष्टिगोचर होगा। कई शहरों में चंद्रमा आंशिक चरण के बाद उदित होगा, इसलिए वहां प्रारंभिक अवस्था दिखाई नहीं देगी।

चंद्रोदय का समय अलग-अलग शहरों में भिन्न रहेगा—

● दिल्ली : लगभग 6:22 बजे
● मुंबई : 6:45 बजे
● कोलकाता : 5:39 बजे
● भोपाल : 6:24 बजे

पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में पूर्ण अवस्था का दृश्य अधिक स्पष्ट रह सकता है, जबकि उत्तर और मध्य भारत में अंतिम चरण प्रमुख रूप से दिखाई देगा।


सूतक काल और धार्मिक मान्यताएं : धार्मिक परंपराओं के अनुसार सूतक काल ग्रहण से लगभग नौ घंटे पूर्व प्रारंभ हो जाता है। इस ग्रहण का सूतक 3 मार्च 2026 को सुबह 6:20 बजे से शुरू होकर शाम 6:47 बजे ग्रहण समाप्ति के साथ समाप्त होगा।

सूतक के दौरान पूजा-पाठ स्थगित रखे जाते हैं और मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं। भोजन में तुलसी दल डालने की परंपरा है और ग्रहण के समय भोजन न करने की सलाह दी जाती है।

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