नई दिल्ली | भारत के रक्षा क्षेत्र में पिछले एक दशक के दौरान बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिला है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार, निवेश और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से देश की रक्षा क्षमताएं मजबूत हुई हैं। सरकार के अनुसार, भारत अब रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ वैश्विक स्तर पर भी अपनी रक्षा क्षमता और उत्पादों की पहुंच का विस्तार कर रहा है।
रक्षा बजट में 3.1 गुना बढ़ोतरी : रक्षा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए बजट में लगातार वृद्धि की गई है। 2013-14 में रक्षा बजट ₹2.53 लाख करोड़ था, जो 2026-27 में बढ़कर ₹7.85 लाख करोड़ हो गया है। इसी अवधि में सैन्य आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत व्यय भी बढ़ा है।
2014-15 में पूंजीगत व्यय ₹94,587.95 करोड़ था, जो 2026-27 में बढ़कर ₹2.19 लाख करोड़ हो गया। इससे नई सैन्य तकनीक, उपकरण और रक्षा प्रणालियों के विकास एवं आधुनिकीकरण को गति मिली है।
रक्षा उत्पादन पहली बार ₹1.78 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर : देश में रक्षा निर्माण को बढ़ावा देने के प्रयासों का असर उत्पादन के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
इस उत्पादन में करीब 76 प्रतिशत हिस्सेदारी सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं की रही, जबकि 24 प्रतिशत उत्पादन निजी क्षेत्र से आया। इससे देश के रक्षा औद्योगिक आधार में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका भी सामने आती है।
रक्षा निर्यात में 56 गुना उछाल : भारत के रक्षा निर्यात में भी पिछले वर्षों में तेजी से वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2013-14 में ₹686 करोड़ का रक्षा निर्यात हुआ था, जो 2025-26 में बढ़कर ₹38,424 करोड़ पहुंच गया। यानी इस अवधि में रक्षा निर्यात में करीब 56 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में निजी क्षेत्र ने ₹17,353 करोड़, यानी कुल रक्षा निर्यात का 45.16 प्रतिशत, योगदान दिया। वहीं रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का योगदान ₹21,071 करोड़ यानी 54.84 प्रतिशत रहा।
सरकार ने वर्ष 2029 तक वार्षिक रक्षा उत्पादन को ₹3 लाख करोड़ और रक्षा निर्यात को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
रक्षा अनुसंधान और स्टार्टअप को भी बढ़ावा : रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक और स्वदेशी अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास का बजट भी बढ़ाया गया है। 2014-15 में ₹13,716.14 करोड़ के मुकाबले यह राशि 2026-27 में बढ़कर ₹29,100.25 करोड़ हो गई है।
वर्ष 2022-23 से रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योग, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थानों के लिए उपलब्ध कराया गया है। इसके अलावा रक्षा परीक्षण पोर्टल के माध्यम से 24 डीआरडीओ प्रयोगशालाओं की परीक्षण सुविधाओं तक घरेलू निर्माताओं, स्टार्टअप और उद्योगों को पहुंच उपलब्ध कराई जा रही है।
स्वदेशी रक्षा खरीद पर जोर : रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) द्वारा स्वदेशी रक्षा प्रणालियों और भारतीय उद्योग को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सरकार के अनुसार, डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और भारतीय उद्योग द्वारा निर्मित प्रणालियों के लिए ₹6 लाख करोड़ से अधिक की आवश्यकताओं को मंजूरी दी गई है।
स्वदेशी रक्षा खरीद के तहत ₹62,000 करोड़ के 97 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों और ₹62,700 करोड़ के 156 एलसीएच प्रचंड हेलीकॉप्टरों की खरीद को मंजूरी जैसे बड़े फैसले शामिल हैं। इन परियोजनाओं से देश की घरेलू एयरोस्पेस और रक्षा निर्माण क्षमता को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
रक्षा खरीद प्रक्रिया में भी किए गए बदलाव : सरकार ने घरेलू कंपनियों के लिए रक्षा क्षेत्र में अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी) 2020 और इससे पहले रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2016 के माध्यम से कई सुधार किए हैं। इनका उद्देश्य स्वदेशी खरीद, घरेलू निर्माण और भारतीय कंपनियों की डिजाइन एवं विकास क्षमता को बढ़ावा देना है।
इसके अलावा रक्षा खरीद नियमावली (डीपीएम) 2025 के माध्यम से राजस्व खरीद में करीब ₹1 लाख करोड़ की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है। इसमें तेज मंजूरी, स्वदेशी परियोजनाओं के लिए प्रोत्साहन और दीर्घकालिक आदेशों से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
भारत की रक्षा नीति में बढ़ती आत्मनिर्भरता, घरेलू उत्पादन, तकनीकी नवाचार और निर्यात पर जोर के साथ देश के रक्षा क्षेत्र का औद्योगिक आधार लगातार विस्तार कर रहा है।

