अश्वगंधा के सेवन से लिवर या किडनी को नुकसान नहीं: अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल ‘फ्रंटियर्स’ में प्रकाशित बड़े क्लिनिकल ट्रायल में पुष्टि

​नई दिल्ली। पारंपरिक भारतीय औषधि अश्वगंधा के नियमित उपयोग की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से चल रही भ्रांतियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक क्लिनिकल ट्रायल ने विराम लगा दिया है।

प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’ (Frontiers in Medicine) में प्रकाशित बहु-केंद्रित, रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड और प्लेसीबो-नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययन में यह सिद्ध हुआ है कि लगातार 24 सप्ताह (करीब 6 महीने) तक मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क (Ashwagandha Root Extract) के दैनिक सेवन से मानव लिवर अथवा किडनी को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचती है।

​यह वृहद अध्ययन भारत के 9 प्रमुख चिकित्सा और अनुसंधान संस्थानों के 45 शीर्ष विशेषज्ञों द्वारा देश के सात केंद्रों पर संयुक्त रूप से संपन्न किया गया।

​1200 लोगों पर 6 माह तक परीक्षण: मानक सीमाओं में रहे सभी अंग

​क्लिनिकल ट्रायल के प्रमुख निष्कर्ष और रूपरेखा:

  • ​प्रतिभागियों का चयन: अध्ययन में 18 से 70 वर्ष के 1,200 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया था, जिन्हें कोविशील्ड वैक्सीन की पहली, दूसरी या बूस्टर खुराक मिल चुकी थी। इनमें से 1,032 प्रतिभागियों (86%) ने 24 सप्ताह का अध्ययन और 28वें सप्ताह तक का फॉलो-अप सफलतापूर्वक पूरा किया।
  • ​दैनिक खुराक: प्रतिभागियों को यादृच्छिक रूप से प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय (aqueous) अश्वगंधा मूल अर्क (जो लगभग 4 ग्राम कच्ची जड़ के चूर्ण के बराबर है) अथवा प्लेसीबो दिया गया।
  • ​लिवर-किडनी फंक्शन पूरी तरह सामान्य: अध्ययन अवधि के दौरान लिवर एंजाइम्स (SGOT, SGPT), बिलीरुबिन, सीरम क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया के स्तर सामान्य शारीरिक संदर्भ सीमाओं के भीतर रहे। दवा के कारण किसी भी अंग को नुकसान का कोई साक्ष्य नहीं मिला और न ही किसी गंभीर साइड इफेक्ट के चलते किसी प्रतिभागी ने ट्रायल छोड़ा

वैक्सीन की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर कोई प्रतिकूल असर नहीं

  • ​85% से अधिक वायरस न्यूट्रलाइजेशन: शोध में यह भी परखा गया कि क्या अश्वगंधा का सेवन टीकाकरण से उत्पन्न एंटीबॉडीज या इम्यूनिटी को प्रभावित करता है। परिणामों में पाया गया कि अश्वगंधा लेने वाले और प्लेसीबो लेने वाले दोनों समूहों में वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता 85% से अधिक बनी रही।
  • ​कोई हस्तक्षेप नहीं: अध्ययन के प्रमुख लेखक एवं सेंटर फॉर रूमैटिक डिजीज (पुणे) के निदेशक डॉ. अरविंद चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि अश्वगंधा ने वैक्सीन से बनने वाले सुरक्षात्मक रिस्पॉन्स में कोई रुकावट नहीं डाली।

​शीर्ष वैज्ञानिकों और आयुष मंत्रालय का दृष्टिकोण

  • ​वैद्य राजेश कोटेचा (सचिव, आयुष मंत्रालय): “उच्च गुणवत्ता वाले कठोर क्लिनिकल शोध से आयुर्वेद के वैज्ञानिक साक्ष्य-आधार को मजबूती मिलती है। यह अध्ययन आधुनिक वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में आयुर्वेद के जिम्मेदार और सुरक्षित उपयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।”
  • ​प्रो. भूषण पाटवर्धन (नेशनल प्रोफेसर, आयुष): “यह शोध इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि किस तरह पारंपरिक औषधियों का मूल्यांकन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के कड़े पैमानों पर सफलतापूर्वक किया जा सकता है।”
  • ​प्रो. रबिनारायण आचार्य (महानिदेशक, CCRAS): “नियंत्रित क्लिनिकल परिस्थितियों में 24 सप्ताह का यह अध्ययन मानकीकृत आयुर्वेदिक योगों के साक्ष्य-आधारित इस्तेमाल को मजबूती प्रदान करता है।”

​यह ऐतिहासिक अध्ययन केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (जयपुर), ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (THSTI) और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया तथा क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया (CTRI) में विधिवत पंजीकृत रहा।

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