नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने आज नई संसद भवन और सरकारी भवनों के मध्य विस्टा परियोजना का सर्वोच्च न्यायालय में सुरजोर आरक्षण किया। सरकार ने कहा कि मौजूदा संसद भवन और मंत्रालय बदलती जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह साबित हो रहे हैं। नए सेंट्रल विस्टा का निर्माण करते हुए न सिर्फ पर्यावरण का ध्यान रखा जाएगा, बल्कि हेरिटेज इमारतों को नुकसान भी नहीं पहुंचेगा।
कुछ कहा गया
केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कई धाराओं के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इन सिद्धांतों में कहा गया है कि बिना उचित कानूनी और पर्यावरण मंजूरी के परियोजना शुरू की गई है। हजारों करोड़ रुपये की यह योजना सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी है। संसद और उसके आसपास के सभी ऐतिहासिक इमारतों को इस परियोजना से नुकसान पहुंचता है।
सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता का जवाब
केंद्र सरकार की तरफ से इसका जवाब देते हुए सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मौजूदा संसद भवन 1927 में बना था। इसकी रचना दो सदन वाले संसद के मुताबिक नहीं थी। सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ जगह जगह गई। कई बार संसद के संयुक्त अधिवेशन में सदस्यों को प्लास्टिक की कुर्सी पर बिठाना पड़ता है। यह सदन की गरिमा के अनुसार नहीं है। अलग-अलग लोकसभा अध्यक्ष नए भवन की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। अभी का संसद भवन भूकंप के लिहाज से सुरक्षित भी नहीं है।
नए भवन में संसद की व्यवस्था करना बहुत आवश्यक है- सॉलिसिटर जनरल
परीक्षण के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने दलील दी थी कि यह वही इमारत है जहां कभी भगत सिंह ने बम फेंका था। एक के बाद एक कई प्रधानों के पद संभालने जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का यह भवन गवाह रहा है। इसका स्वरूप बनाए रखना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने इसका जवाब में कहा कि मौजूदा संसद भवन एक ऐतिहासिक धरोहर है। यह बचत कर रखने की जरूरत है। लेकिन इस समय में इस तरह के बदलाव से कई तरह के बदलाव हुए। बिजली की लाइन बिछाई गई। सीवर प्रणाली लगाई गई। तमाम चीजों से इमारत को धीरे-धीरे नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में इसका उपयोग कर बंद कर नए भवन में संसद की व्यवस्था करना बहुत आवश्यक है। मेहता ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान संसद भवन को भविष्य में संसदीय संग्रहालय की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि लोग इतिहास से परिचित हों।
सरकारी धन की बर्बादी हो रही है
केंद्र सरकार के वकील ने यह भी कहा कि इस बार सभी मंत्रालय कई इमारतों में बिखरे हुए हैं। एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय जाने के लिए अधिकारियों को वाहन का इस्तेमाल करना पड़ता है। कुछ मंत्रालयों का किराया देने में हर साल सरकार के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। नए मंत्रालय भवन के बनने से सभी मंत्रालय एक ही छत के नीचे होंगे। इसलिए, यह कहना गलत है कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण में सरकारी धन की बर्बादी हो रही है। बल्कि अब तक होने वाली धन की बर्बादी को रोकने के लिए यह परियोजना बहुत आवश्यक है।
केंद्र सरकार ने इन दलीलों का भी खंडन किया कि इस परियोजना से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा। सॉलीसीटर जनरल ने बताया कि परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी ली गई है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि इसके निर्माण से पर्यावरण को कोई नुकसान न पहुंचे।
ब्रिटिश काल में बने साउथ ब्लॉक, नॉर्थ ब्लॉक, संसद भवन सहित ऐतिहासिक इमारतों के आसपास नए निर्माण के विरोध का भी तुषार मेहता ने जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि संसद भवन और मंत्रालयों को गुरुग्राम, पानीपत या नोएडा में नहीं बनाया जा सकता है। उनका निर्माण वही होगा, जहाँ उचित है। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि इसकी वजह से ऐतिहासिक इमारतों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। कोर्ट ने सरकार के इस आश्वासन को नोट किया कि राष्ट्रीय अभिलेखागार की इमारत को छोड़कर किसी भी मौजूदा इमारत की एक ईंट भी नहीं खिसकाई जाएगी।
मामले की सुनवाई कल भी जारी रहेगी
जस्टिस ए एम खानविलकर की शीर्ष वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि परियोजना को लेकर बहुत सारा विवाद सिर्फ इस कारण से है कि इससे जुड़ी जानकारियों को सामूहिक नहीं किया गया है। इसके जवाब में सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि सभी आवश्यक बदलावों की अलग-अलग संभावनाएं हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे लोग प्रोजेक्ट से जुड़ी जानकारियों को एक ही जगह पर देख सकें। मामले की सुनवाई कल भी जारी रहेगी।


