जो लोग अपने माता पिता काे सुखी रखते हैं उन्हें कभी दुखी नहीं होना पड़ता- मुनिश्री
दतिया. अपने कल्याण की कामना करने वाले लोगों को तो अपने कल्याण का काम स्वयं ही करना पड़ेगा । जिस प्रकार बीमार होने पर ठीक होने के लिए दवाई तो स्वयं ही लेनी पड़ती है। संसार का काम तो कोई और भी कर लेगा, वह तो ऐसे ही चलता रहता है। यह विचार क्रांतिकारी मुनिश्री प्रतीक सागर महाराज ने गुरूवार को सोनागिर स्थित आचार्यश्री पुष्पदंत सागर सभागृह में धर्मसभा मे संबोधित करते हुए व्यक्त िकिए। मुनिश्री ने कहा कि परमात्मा हमारे घट में ही मौजूद हैं, वे हमसे दूर नही हैं । यदि वे हमें नहीं मिलते तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे हमसे दूर हैं, बल्कि हमारे अंदर उनको पाने की लगन की कमी है। निरंतर बदलते संसार पर विश्वास करना ही भगवत्प्राप्ति में मुख्य बाधा है।

उन्होंने कहाकि मां-बाप की सेवा करना धर्म है । जितना हम धर्म का पालन करेंगे उतना सुख हमें उत्पन होगा । बुजुर्गों की सेवा तो होती है, साथ-साथ सुख भी उत्पन्न होता है। मां-बाप को सुख दें तो हमें सुख अपने आप मिलता है। जो लोग अपने माता पिता काे सुखी रखते हैं उन्हें कभी दुखी नहीं होना पड़ता। मुनिश्री ने श्रीराम का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान श्रीराम, सीता जी से कहते हैं कि माता-पिता और गुरु ये तीन प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी अवहेलना करके अप्रत्यक्ष देवता की आराधना करना कैसे ठीक हो सकता है। जिनकी सेवा से अर्थ, धर्म और काम तीनों की प्राप्ति होती है। उनकी आराधना से तीनों लोकों की आराधना हो जाती है। माता-पिता के समान पवित्र इस संसार में दूसरा कोई भी नहीं है। इसलिए लोग इन प्रत्यक्ष देवता माता-पिता व गुरु की आराधना करते हैं।

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