नई दिल्ली/कोलकाता। पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ के सफल क्रियान्वयन के तीन वर्ष पूरे हो गए हैं। केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) द्वारा योजना की तीसरी वर्षगांठ का राष्ट्रीय समारोह 17 सितंबर 2026 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित ‘धोणो धान्यो सभागार’ में आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में केंद्रीय MSME मंत्री जीतन राम मांझी, केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे, सुवेंदु अधिकारी सहित केंद्र व राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
तीन साल में हासिल की गई प्रमुख उपलब्धियां:-
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30 लाख का सफल पंजीयन: त्रि-स्तरीय कड़ी सत्यापन प्रक्रिया के बाद देशभर के 18 पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े 30 लाख शिल्पकारों का योजना में पंजीकरण पूरा हो चुका है।
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कौशल प्रशिक्षण: कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के माध्यम से अब तक करीब 24.50 लाख विश्वकर्माओं को बुनियादी और उन्नत तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।
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₹5,297 करोड़ का ऋण वितरण: योजना के तहत 6.18 लाख कारीगरों को 5% की रियायती वार्षिक ब्याज दर पर ₹1 लाख तक का बिना गारंटी ऋण (कुल ₹5,297 करोड़) उपलब्ध कराया गया।
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18.15 लाख आधुनिक टूलकिट वितरित: इंडिया पोस्ट (डाक विभाग) के जरिए 18.15 लाख कारीगरों के घरों तक आधुनिक टूलकिट पहुंचाए गए, जिससे उनके काम की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में इजाफा हुआ है।
पश्चिम बंगाल में मई 2026 से लागू हुई योजना, कोलकाता में स्टॉल प्रदर्शनी : पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मई 2026 में इस योजना को राज्य में अंगीकार किए जाने के बाद अब तक 3,000 लाभार्थियों का त्रि-स्तरीय सत्यापन पूरा हो चुका है, जिन्हें वर्तमान में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कोलकाता में आयोजित होने वाले समारोह में इन लाभार्थियों को पीएम विश्वकर्मा प्रमाण पत्र, आईडी कार्ड, ऋण स्वीकृति पत्र और टूलकिट वितरित किए जाएंगे।
कार्यक्रम स्थल पर पारंपरिक शिल्प उत्पादों की एक विशाल प्रदर्शनी भी आयोजित होगी, जिससे कारीगरों को सीधे बाजार और खरीदारों से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
पारंपरिक हुनर को बाजार और तकनीक से जोड़ने का प्रयास : 17 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई यह योजना बढ़ई, लोहार, कुम्हार, मूर्तिकार, मोची और दर्जी जैसे 18 व्यवसायों को पहचान और संस्थागत वित्तीय मदद देती है। तीन वर्षों की यह यात्रा दर्शाती है कि योजना ने देश के अंतिम छोर पर बैठे हुनरमंद कारीगरों को आत्मनिर्भर उद्यमी बनाने में ठोस भूमिका निभाई है।

