‘समुद्र मंथन’ से गहरे पानी में तेल-गैस की खोज को मिलेगी रफ्तार : कैबिनेट ने ₹84,084 करोड़ की योजना को दी मंजूरी, 60 डीप-वॉटर कुओं की खुदाई का लक्ष्य

नई दिल्ली | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में अपतटीय तेल और गैस के अन्वेषण को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना ‘समुद्र मंथन’ को मंजूरी दी है। वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू होने वाली इस केंद्रीय क्षेत्र योजना के लिए 84,084 करोड़ रुपए का परिव्यय निर्धारित किया गया है। सरकार के अनुसार, यह भारत का अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी अपतटीय अन्वेषण अभियान है, जिसका उद्देश्य घरेलू हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज को तेज करना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है।

60 गहरे पानी के कुओं की होगी खुदाई : योजना के तहत गहरे पानी वाले क्षेत्रों में 60 अन्वेषण कुओं की खुदाई का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 43,200 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। सरकार गहरे पानी के अन्वेषण कुओं की पात्र खुदाई लागत का 50 प्रतिशत तक, अथवा प्रति कुएं अधिकतम 675 करोड़ रुपए, जो भी कम हो, वित्तीय सहायता के रूप में उपलब्ध कराएगी।

सरकार का मानना है कि इस कदम से अन्वेषण कंपनियों के जोखिम को कम करने, निजी निवेश को आकर्षित करने और देश के गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल एवं गैस की संभावनाओं को तलाशने में मदद मिलेगी।

चार प्रमुख क्षेत्रों पर होगा काम : ‘समुद्र मंथन’ योजना के तहत अपतटीय अन्वेषण को चार प्रमुख स्तरों पर आगे बढ़ाने की योजना है। इसके तहत 28,534 करोड़ रुपए आधुनिक अपतटीय भूकंपीय डेटा जुटाने और उसके रिकॉर्ड के लिए निर्धारित किए गए हैं।

वहीं, गहरे पानी में अन्वेषण एवं उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों के लिए 43,200 करोड़ रुपए, साझा अपतटीय बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 10,000 करोड़ रुपए और तेल-गैस क्षेत्र में उपकरणों एवं सेवाओं के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के लिए 2,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त निगरानी, डिजिटल उपाय, मूल्यांकन, मानव संसाधन और जागरूकता जैसी गतिविधियों के लिए 350 करोड़ रुपए रखे गए हैं।

कृष्णा-गोदावरी से अंडमान तक संभावनाओं की तलाश : भारत की भविष्य की अपतटीय हाइड्रोकार्बन क्षमता मुख्य रूप से कृष्णा-गोदावरी, कावेरी, महानदी और अंडमान जैसे गहरे एवं अति-गहरे जल क्षेत्रों में मानी जा रही है। इन क्षेत्रों में अन्वेषण के लिए अत्याधुनिक तकनीक और बड़े निवेश की आवश्यकता होती है।

सरकार के अनुसार, एक गहरे पानी के अन्वेषण कुएं की लागत करीब 125 से 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक हो सकती है। ऐसे में ‘समुद्र मंथन’ के तहत जोखिम साझा करने की नीति अपनाकर अन्वेषण गतिविधियों को गति देने का प्रयास किया जाएगा।

99% से अधिक ‘नो-गो’ क्षेत्र हटाए गए : सरकार के मुताबिक, पिछले वर्षों में तेल और गैस क्षेत्र में कई नीतिगत एवं संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं। अपतटीय क्षेत्र में पहले ‘नो-गो’ माने जाने वाले 99 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रों को हटाया गया है, जिससे भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र पहली बार अन्वेषण के लिए उपलब्ध हुआ है।

इसके अलावा, संविदात्मक व्यवस्था में बदलाव, विधायी सुधार और नए नियमों के माध्यम से क्षेत्र में निवेश एवं कारोबार के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास किया गया है। सरकार ने ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के प्रदर्शन मानकों में भी अन्वेषण गतिविधियों को अधिक महत्व देने की बात कही है।

घरेलू तेल-गैस उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य : सरकार के अनुसार, मौजूदा तेल और गैस क्षेत्रों में प्राकृतिक उत्पादन में हर साल करीब 6 से 7 प्रतिशत की गिरावट आ रही है। ऐसे में घरेलू उत्पादन को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए लगातार नए क्षेत्रों की खोज जरूरी है।

‘समुद्र मंथन’ के तहत अन्वेषण में सफलता मिलने पर घरेलू तेल और गैस उत्पादन को मौजूदा करीब 62 एमएमटीओई से बढ़ाकर 80 एमएमटीओई प्रतिवर्ष करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही हाइड्रोकार्बन संसाधन आधार को 1.6 टीओई से बढ़ाकर 2.2 टीओई करने का भी उद्देश्य है।

कच्चे तेल के आयात में कमी लाने पर जोर : भारत दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल उपभोक्ताओं में शामिल है और देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। सरकार का अनुमान है कि योजना के तहत अन्वेषण में सफलता मिलने और घरेलू उत्पादन बढ़ने पर कच्चे तेल के आयात में करीब 1 लाख करोड़ रुपए सालाना तक की कमी आ सकती है।

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