अमृतसर । बठिंडा जिले के भगता भाईका के गुरसिख मनकीरत सिंह अपने नाम को गुरु की सेवा से सार्थक कर रहे हैं। वह सोने की स्याही से श्री गुरु ग्रंथ साहिब लिख रहे हैं। वह कहते हैं कि इस काम से बड़ा सुकून मिलता है। गुरु साहिब के चरणों में बैठने जैसा अहसास होता है। इस काम में पांच साल लगेंगे लेकिन यह सेवा हर हाल में पूरा करूंगा। संगीत में मास्टर डिग्री हासिल करने वाले मनकीरत सिंह ने 2018 में यह पावन कार्य शुरू किया। तब वह प्राइवेट स्कूल में शिक्षक थे। अपनी तनख्वाह इसी सेवा पर लगा रहे थे। कोरोना महामारी के कारण वेतन मिलना बंद हुआ तो नौकरी छोड़नी पड़ी, लेकिन उनके काम पर असर नहीं पड़ा। अभी वह आढ़त का काम करते हैं और आय बड़ा हिस्सा इस काम में लगाते हैं।
वह बताते हैं कि पहले कुछ लोगों का सहयोग मिलता था, लेकिन कोरोना काल में वह भी बंद है। लेखन सामग्री को लेकर भी दिक्कत आ रही है। ये सामान उन्हें लखनऊ, दिल्ली, राजस्थान व कश्मीर से मंगवाना पड़ता है, लेकिन लाकडाउन के कारण सामान मंगवाने में परेशानी आई। स्थानीय स्तर पर ही कुछ सामान जुटाकर काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि इस कार्य पर 30 से 35 लाख रुपये खर्च आने का अनुमान है। अभी पांच साल और लगेंगे।
मनकीरत अभी तक 250 अंग (पन्ने) लिख चुके हैं। रोज वह छह से सात घंटे समय देने के बाद एक पन्ना लिख पाते हैं। लिखावट के लिए भी उन्होंने गुरुद्वारा साहिब में कड़ा अभ्यास किया है। इसके लिए खास किस्म की कलम इस्तेमाल होती है, जिसकी लकड़ी विजयसार नाम के औषधीय गुणों वाले पौधे से मिलती है। कुल 1430 (अंग) पन्ने लिखने का लक्ष्य है। इसके अलावा 30 (अंग) पन्ने अलग से लिखेंगे। एक पेज पर करीब 700 से एक हजार रुपये तक का खर्च आता है। लिखने का काम पूरा हो जाने के बाद जिल्द (कवर) सोने की बनवाई जाएगी, जिसमें करीब चार से पांच सौ ग्राम सोने का इस्तेमाल होगा।
मनकीरत ने बताया कि लेखन में खास किस्म की स्याही इस्तेमाल होती है। इसके लिए सोना व लाजवर्द (मूल्यवान नीले रंग का पत्थर) बराबर मात्रा में मिलाते हैं। इसके बाद कीकर (बबूल) की गोंद व विजयसार की लकड़ी के पानी के मिश्रण को तांबे के बर्तन में डाल कर नीम के बुरादे से स्याही तैयार की जाती है। भृंगराज समेत अन्य सामान डालकर इसकी करीब 20 दिन तक रगड़ाई करनी पड़ती है। स्याही का रंग काला ही रहता है, लेकिन सोना मिला होने से कम रोशनी में भी अक्षर चमकने लगते हैं।


