नई दिल्ली। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा ‘पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का भविष्य’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को रविवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संबोधित किया। नई दिल्ली में आयोजित इस वैश्विक मंच पर राष्ट्रपति ने जलवायु परिवर्तन की जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, स्थानीय जन-समुदायों की भागीदारी और जन-केंद्रित अनुकूलन नीतियों को लागू करने पर विशेष बल दिया।
उन्होंने रेखांकित किया कि जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह मानव अस्तित्व, खाद्य सुरक्षा, जल आपूर्ति, जन-स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ा गंभीर असंतुलन है।
नीतियों के केंद्र में हों ग्रामीण, वनवासी और छोटे किसान : राष्ट्रपति ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की मार सबसे अधिक समाज के संवेदनशील वर्गों पर पड़ती है, इसलिए समाधान की रूपरेखा में उन्हें अग्रणी भूमिका मिलनी चाहिए:
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समावेशी नीतिगत ढांचा: उन्होंने कहा कि जलवायु नीतियों में केवल सरकारों और कानूनी विशेषज्ञों की ही नहीं, बल्कि उन स्थानीय समुदायों की सक्रिय सहभागिता अनिवार्य होनी चाहिए, जो इससे सीधे प्रभावित होते हैं। ग्रामीण समाज, वनवासी, छोटे किसान और महिलाएं प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
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पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभव: सदियों पुरानी पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय समुदायों के जमीनी अनुभव जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) को व्यावहारिक और टिकाऊ बनाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
केवल पेड़ लगाना ही काफी नहीं, संधारणीय वनीकरण जरूरी : पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर राष्ट्रपति ने स्पष्ट दृष्टिकोण रखते हुए कहा:
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इकोसिस्टम का पुनर्जीवन: संधारणीय वनीकरण का वास्तविक उद्देश्य सिर्फ औपचारिकता के लिए “पेड़ लगाना” नहीं होना चाहिए, बल्कि स्थानीय जैव-विविधता के अनुकूल स्वस्थ और स्वनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्रों को दोबारा स्थापित करना है।
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विकास और पर्यावरण में संतुलन: उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को ऐसा मार्ग चुनना होगा जो विकास की प्राथमिकताओं और आर्थिक आकांक्षाओं को सुरक्षित रखते हुए जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता विकसित करे। जलवायु उपाय तकनीकी रूप से व्यावहारिक और आर्थिक रूप से व्यवहार्य होने चाहिए।
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मिशन LiFE का उल्लेख: भारत सरकार की ‘मिशन LiFE’ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) पहल का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने बताया कि कैसे जन-भागीदारी और सामुदायिक सक्रियता के जरिए पर्यावरण चेतना को जन-आंदोलन बनाया जा सकता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुनिया भर के न्यायविदों, न्यायाधीशों और पर्यावरण विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाने के लिए एनजीटी (NGT) के प्रयासों की सराहना की और उम्मीद जताई कि इस मंथन से प्रभावी व व्यावहारिक वैश्विक कार्य-योजना तैयार होगी।

