दतिया. परमाणु बम से जमीन का टुकड़ा जीता जा सकता है, मगर अहिंसा और प्रेम से विश्व के सभी लोगों का दिल जीत सकते है. अहिंसा पर केवल चर्चा नहीं होना चाहिए, वह आचरण में भी उतरना चाहिए. अहिंसा के साथ करुणा का जन्म होता है, हिंसा के साथ क्रूरता का जन्म होता है. क्रूर व्यक्ति लादेन, औरंगजेब बन सकता है, मगर विवेकानंद, भगवान महावीर स्वामी, महात्मा गांधी नहीं बन सकता है. यह विचार क्रांतिवीर मुनि प्रतीक सागर ने रविवार को सोनागिर स्थित अमोल वाली धर्मशाला में अहिंसा रैली धर्म सभा को संबोधित करते हुए कही. उन्होंने कहा कि मानवता को बचाए रखने के लिए अहिंसा को जीवित रखना जरुरी है. शरीर में जो महत्व प्राणों का है, जीवन में वही महत्व अहिंसा का है. गांधीजी ने तीन बंदर बताएं, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो, मगर आज एक और बंदर की आवश्यकता है बुरा मत सोचो. जो दिल पर हाथ रखकर के बैठा हो.
अहिंसा महारैली में गांधी की वेशभूषा में निकले बच्चे
चातुर्मास समिति के प्रचार संयोजक सचिन जैन आदर्श कलम ने बताया कि अहिंसा रैली का प्रारंभ अमोल वाली धर्मशाला से मास्क ओर सोशल डिस्टेसिंग के साथ शुरू होकर विभिन्न मार्गो से होते हुए सोनागिर गेस्ट हाउस पहुंची. वहां से तेरापंथी कोठी होते हुए अमोल वाली धर्मशाला पहुंची. गांधी जी के वेशभूषा में बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था. अहिंसा रैली में जैन संतों का भी सानिध्य प्राप्त हुआ. रैली बाद में विशाल धर्मसभा के रूप में परिवर्तित हुई. जहां पर दो आचार्यों के कर कमलों से क्रांतिवीर मुनि प्रतीक सागर का केस लोच किया गया.


