नई दिल्ली। पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैश्विक पहल के रूप में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान ‘दिल्ली घोषणापत्र’ जारी किया गया। इस घोषणापत्र के माध्यम से पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के सुरक्षित, प्रभावी और साक्ष्य-आधारित एकीकरण पर विशेष जोर दिया गया है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) को मजबूत किया जा सके।
यह सम्मेलन 17 से 19 दिसंबर के बीच नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार और WHO के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। सम्मेलन का विषय था — “संतुलन की पुनर्स्थापना: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान एवं अभ्यास”।
100 से अधिक देशों की सहभागिता, वैश्विक सहमति का दस्तावेज : ‘दिल्ली घोषणापत्र’ के निर्माण में 100 से अधिक देशों के स्वास्थ्य नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों और पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े हितधारकों ने योगदान दिया। इसमें पारंपरिक चिकित्सा को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों का हिस्सा बनाने, विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर इसके समावेशन की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।
सुरक्षा, शोध और नवाचार पर केंद्रित चार प्रमुख संकल्प : घोषणापत्र चार प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित है—
- साक्ष्य-आधारित शोध को सशक्त बनाना,
- गुणवत्ता, सुरक्षा और सार्वजनिक विश्वास सुनिश्चित करना,
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में पारंपरिक चिकित्सा का सुरक्षित एकीकरण,
- डिजिटल तकनीक, डेटा विज्ञान और नवाचार का जिम्मेदार उपयोग।
इन संकल्पों का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप विकसित करना और वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे में उसकी उपयोगिता को सुदृढ़ करना है।
भारत की भूमिका को WHO ने सराहा : WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस ने पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के समन्वय को लेकर भारत की पहल की सराहना की। वहीं, आयुष मंत्रालय ने इसे पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक वैश्विक रोडमैप बताया, जो शोध, मानकीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा देगा।
‘दिल्ली घोषणापत्र’ को पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकृत होने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है, जो भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों को सहयोग, संतुलन और समग्र कल्याण के सिद्धांत पर आधारित करेगा।


